एडवांस लेवल वर्कशॉप
प्राण, अपान, मेरुदंड, मस्तिष्क और मन के पारस्परिक संबंधों को समझने की एक अनुभवात्मक यात्रा।
कार्यशाला की भूमिका
प्राण-विज्ञान: सिद्धांत से स्वानुभव तक
सामान्यतः क्रिया योग को प्राणकर्म कहते हैं। यह मूलतः प्राण का ही विज्ञान है। इसमें प्राण को अपान में, और अपान को प्राण में तिरोहित किया जाता है।
मुझे क्रिया योग का अभ्यास करते हुए पैंतीस वर्ष से अधिक हो चुके हैं। इस यात्रा में मैंने कई बार प्राण और अपान को समझकर अनुभव करें का प्रयत्न किया। हर बार इन दोनों के महत्व का अनुभव एक नए ढंग से हुआ। आज मैं कह सकता हूँ: किसी भी क्रिया-विधि के प्रारंभिक चरण को केवल सीखे जा सकते हैं, किंतु उसकी अंतरतम गहराई को स्वयं के अनुभव से ही जाना जा सकता है।
जब भी मैं अपने अनुभवों का मिलान प्राण-विज्ञान से करता हूँ, उसकी सत्यता का बोध स्वतः हो जाता है। अनुभव ही जीवन का सार है, और हर किसी को उससे गुज़रना चाहिए। इसी अनुभव से मैंने जाना कि क्रिया योग के माध्यम से प्राण-विज्ञान का बोध कैसे उत्पन्न होता है। उसी का विवरण मैं इस कार्यशाला के माध्यम से आप तक पहुँचाना चाहता हूँ।
प्राण और अपान का मूलभूत विज्ञान इसके क्रम चक्र को समझना ।
प्राण, अपान और मन का संबंध तथा मेरुदंड में इसका संचालन ।
मध्यावस्था, सुषुम्ना और समान अवस्था ।
श्वास के माध्यम से प्राण और अपान का गहन अभ्यास और अनुभव ।
क्रिया योग में प्राण अपान से चक्र-भेदन
यह कार्यशाला किसके लिए है
क्रिया योग का यह एडवांस (सरलतम) स्तर विद्यार्थियों से लेकर वृद्धजनों तक, सबके लिए उत्तम है। अभ्यास सरल है, और मानसिक व आध्यात्मिक विकास के लिए अत्यंत ज्ञानवर्धक है।
प्राण और अपान की ऊर्जा से यह देह-मस्तिष्क स्वाभाविक रूप से कैसे चलायमान होता है? इसी से रचे गए वातावरण में मन कैसे प्रभावित होता है? और उस प्रभावित मन को उस वातावरण से परे कैसे ले जाया जाए? यह सब हम क्रिया योग के माध्यम से जान सकते हैं।
क्रिया योग केवल एक क्रिया नहीं है। क्रिया से पहले उसके सिद्धांतों को समझना विद्यार्थियों के लिए सबसे आवश्यक है। जो सिद्धांत समझकर अभ्यास करता है, वह प्राण-ऊर्जा के प्रभावों और दुष्प्रभावों से सहज ही मुक्त हो सकता है। यही क्रिया योग का मूल उद्देश्य है।
साँसों के माध्यम से भी हम प्राण-ऊर्जा को समझने का प्रयास करेंगे। किंतु ध्यान रहे, प्राण-ऊर्जा और साँस की ऊर्जा में बहुत भिन्नता है।
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