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उदान वायु + एकाग्रता में दोष: वर्कशॉप  

अर्थ: उदान शब्द (उत्+अन) का मूल अर्थ ऊपर की ओर उठना होता है । आध्यात्मिक स्तर से मैं का स्वयं की चेतना में स्थित हो जाना, राजयोग की दृष्टि से मन का उठकर शून्य में विलय, योग के स्तर पर नाभि के ऊपर के हिस्से का उठना, प्राणायाम के स्तर पर सांसों का ऊपर उठना , मानसिक स्तर पर ज्ञानेंद्रियों का अति सक्रिय हो उठना, कर्मेन्द्रियों की दृष्टि से नाभि का ऊपर उठना होता है और अंत में रोग की दृष्टि में वायु का ऊपर उठना होता है । 

अंततः प्राणवायु के अनुसार पाँच वायु ( प्राण, उदान, अपान, समान और व्यान) में यह उदान वायु ज्ञानेंद्रियों की अभिव्यक्ति का श्रोत है । इसीलिए इसे “उत्तरायणं प्राणो गच्छति।” अर्थात् प्राण का उत्तर दिशा में गमन को बहुत शुभ मान जाता है । किंतु यदि यह नकारात्मक रूप में आता है तो मन मस्तिष्क को पूर्ण रूप से भ्रमित करके “स्मृति लोप” कर देता है और मृत्यु का द्वार खोल देता है । जीवित रहते हुए भी मृत्यु ही दिखता है । 

यह खगोलीय घटना (सूर्य का उत्तरायण होना) नहीं है बल्कि प्रतीकात्मक रूप से इसका मूल संबंध अन्तर्मन की उर्ध्वगति से है, जिसका संबंध साधक की आंतरिक विकासयात्रा से है । जब साधक का प्राण (मन मस्तिष्क व अंतरमन) गुरुत्वाकर्षण से ऊपर उठता है, तब वह उत्तरायण मार्ग पकड़ता है।             

किंतु आत्मीय एवं चिकित्सीय दृष्टि से देखें जैसे जैसे मन-मस्तिष्क का उच्चतर विकास इन्द्रियों में में अज्ञानतावश तनाव देकर हुआ होता है तो नाभि के ऊपर का क्षेत्र तनावग्रस्त हो उठता है जिसके कारण देह के साथ साथ मस्तिष्क में अनेक प्रकार की व्याधियाँ स्वाभाविक रूप से आने लगती है । किंतु यहीं पर इन्द्रियों को  शिथिल करके चेतना का विकास किया गया है तो यह ज्ञानात्मक होने के साथ साथ दैहिक और मस्तिष्कीय दृष्टि से स्वस्थ कर देती है । 

मैं इसका संबंध सबसे अधिक ज्ञानेंद्रियों से देखता हूँ  इसीलिए इसके असंतुलन से मस्तिष्क एवं सिर व सिर दर्द (माइग्रेन), आंखों में निरंतर भारीपन, ज्ञानेंद्रियों (आँख, नाक, कान, त्वचा, जिह्वा) से संबंधित सभी रोग होने लगते हैं । और साथ साथ नाभि से ऊपर अर्थात डायफ़्राम, छाती, हृदय, पीठ, गला से संबंधित बहुत सारी समस्याएं पनपने लगती हैं । कहने का मूल अर्थ है कि देह के उत्तर दिशा अर्थात् नाभि के ऊपर के सभी हिस्सों में कहीं न कहीं असंतुलन जन्म लेने लगता है । 

शरीर के संदर्भ में देखें तो नाभि से ऊपर की दिशा जिसे उत्तर दिशा मानते हैं — डायाफ़्राम, हृदय, कंठ, भ्रूमध्य और सहस्रार तक का जो मार्ग है — वह योग में ऊर्ध्व मार्ग कहलाता है। इसी मार्ग से प्राण ऊपर उठता है — और यही उदान वायु का कार्यक्षेत्र है। 

अब यदि यह दक्षिण से उत्तर की ओर बहने वाली उदान वायु असंतुलित हो जाए, तो यही मार्ग बाधित हो जाता है — और चेतना व सोच व विचारों का प्रवाह नीचे अर्थात् नाभि के नीचे की ओर, तमस की ओर, गिरने लगता है। यद्यपि उदान वायु को श्रुति ग्रंथों में मृत्यु के समय प्राण को बाहर ले जाने वाली वायु कहा गया है। 

ब्रह्मसूत्र कहता है —“उदानः स्मृति लोपे” — अर्थात् उदान वायु में दोष के कारण स्मृति का लोप (ह्रास) होने लगता , इसे जीवन में रहते हुए ही मृत्यु कहा जा सकता है ।  

उदान वायु का मूल कारण

1- मानसिक और आध्यात्मिक कारण: 

मुझे यह कारण सर्वाधिक महत्वपूर्ण अनुभव हुआ है जिसमें अतिचिंतन, अतिचिंता , चिंतन करते समय इंद्रियों में खिंचाव, और एकाग्रता में दोष सम्मिलित है । ज्यादातर एकाग्रता के द्वार इन्द्रियों में अज्ञात रूप से तनाव ही इस समस्या का मूल कारण हो जाता है । ये सभी मानसिक समस्याएं ही उदान वायु में सबसे अधिक दोष उत्पन्न करती हैं ।   

2- भौतिक करण: 

उदान वायु में संतुलन एवं असंतुलन का वाह्य व भौतिक कारण भी महत्वपूर्ण होता है । जैसे किसी भी शारीरिक अभ्यास चाहे वह जिम, योग प्राणायाम व ध्यान हो , यदि बिना समझबूझकर अति किया जाता है तो सबसे अधिक उदान वायु ही प्रभावित होता है । जिसका सबसे पहला लक्षण डकार , पेट के ऊपरी हिस्से का हमेशा फूले रहना,  छाती और गले में दबाव का बने रहना, ऐसा लगना कि हृदयघात हो जाएगा, और सभी गुणेंद्रियों में तनाव बने रहना इत्यादि अनेक कहानी का दिखना स्वाभाविक हो जाता है । 

उदान वायु के संतुलन के लिए : 

उदान में संतुलन कैसे स्थापित किया जाये, इसके लिए योग और प्राणायाम की विधियों के द्वारा जिसका प्रयोग मैंने स्वयं किया है, इस वर्कशॉप में किया जाएगा । 

1- योगिक आसन: 

दोषों को कैसे दूर किया जाये , नाभि के ऊपर के हिस्सों में यौगिक चिकित्सा के माध्यम से कैसे समस्या का हल . ये ऐसे आसन हैं जो प्रमुख रूप से नाभि एवं नाभि के ऊपर के हिस्से को समुचित तरीके से व्यवस्थित करने के लिए बनाया गया है । 5 आसन जो विशेष रूप से उदान वायु के लिए ही रचित हैं । इन सभी पांचों आसनों का इस वर्कशॉप में चर्चा किया जाएगा ।  

2- प्राणायाम: 

तीन प्रमुख प्राणायाम का विस्तार पूर्वक व्याख्या किया जाएगा जो उदान वायु के दोषों को ही नहीं बल्कि उन सभी इन्द्रियों और मानसिक अवस्थाओं को स्थिर करने में भी सहायता करती हैं । 

  • एब्डोमन तो चेस्ट ब्रीथिंग (Abdomen to Chest Breathing)
  • चेस्ट तो एब्डोमन (छाती से पेट) ब्रीथिंग (Chest To Abdomen Breathing)
  • उदर प्राणायाम (abdominal Breathing)  साथ में कुछ अन्य प्राणायाम भी जोड़े जा सकते हैं । 

3- ध्यान: 

यद्यपि उदान वायु के असंतुलन में ध्यान का अभ्यास उचित नहीं होता , यहाँ तक कि ध्यान के ग़लत तरीकों के अभ्यास से भी उदान वायु में असंतुलन देखा गया है । किंतु इसके बावजूद क्रिया योग ध्यान के अभ्यास के द्वार मुझे ऊर्ध्व वायु को नीचे की ओर लाने में 30 प्रतिशत तक सफलता मिली है । इसीलिए इस प्रयोग का भी विवरण दिया जाएगा इस वर्कशॉप में । 

Note- This Workshop will be reserved only for 51 people..


Udaan Vayu Workshop

Content Hours: 6 hour(s)
Fee: 5100/-
Duration : 2 Days
From 2025-09-13 To 2025-09-14

Copyright - by Yogi Anoop Academy