विचारों को देखो—असली अर्थ क्या है?
जब मैं किसी साधक को कहता हूँ "विचारों को देखो", तो अक्सर एक अजीब चीज होती है। वह तुरंत अपने विचारों को *देखने का प्रयास* करने लगता है—उन्हें किसी बाहरी वस्तु के रूप में, जैसे कोई दूर से चलती हुई गाड़ी को देख रहा हो। वह सोचता है कि विचार कुछ चीजें हैं जिन्हें वह अलग से, दूरी बनाकर, निरीक्षण कर सकता है। यह गलतफहमी गहरी और व्यापक है। और यह केवल एक व्यक्ति की नहीं, बल्कि उन सभी की है जो मन के स्वभाव को समझने का प्रयत्न ही नहीं ।
पहला प्रश्न: विचारों को देखकर होगा क्या?
जब "विचारों को देखो।" का मूल अर्थ है , विचारों की पूरी प्रक्रिया को समझना । जैसे ही इस प्रक्रिया में प्रवेश करता है, विचार कर्ता विचार करना ही बंद कर देता है। इसी को मैं विचारों को देखना कहता हूँ। यद्यपि समझने की प्रक्रिया में विचार चलते हैं किंतु वह चलना बिल्कुल न के बराबर होता है । वे न के बराबर विचार का कोई महत्व नहीं होता है , समझने का अधिक महत्व होता है । उन बहुत कम विचारों में इतने विश्राम के पल होते अहीन कि विचार विहीनता का अनुभव अधिक होने लगता है और इसी अवस्था में स्वयं के अनुभव का समय मिल जाता है । इसी प्रक्रिया में विचार कर्ता को समय मिल जाता है स्वयं को अनुभव करने का ।
थोड़ा और अधिक समझने का प्रयत्न करते हैं , यदि विचार करने की प्रक्रिया शुरू हुई तो उसी समय भावों की उत्तपत्ति प्रारंभ हो जाती है । जैसे ही भाव उत्पन्न होते हैं वैसे ही “मैं” विचारों में उलझ जाता है , अब उस पल विचारों को वह देख कैसे सकता है । अर्थात् विचारों के चलने का तात्पर्य ही है कि विचारों में उलझना । तो यह स्वतः सिद्ध हुआ कि विचारों में उलझने वाला विचारों को देख नहीं सकता है ।
तो फिर विचारों को देखने का मूल अर्थ क्या हुआ । इसका अर्थ समझने की प्रक्रिया है , समझने की प्रक्रिया में विचार बहुत कम और धीमी गति से चलते हैं जिससे दो विचारों में अवकाश बहुत अधिक मिलता है , वही अवकाश निर्विकार अवस्था कहलाती है । इसी अवस्था में “मैं” स्वयं की अनुभूति करने में सक्षम हो जाता है । इस पूरी प्रक्रिया को ही विचारों को देखना कहते अहीन , ये मेरा अनुभव है । मैं अन्य के अनुभवों पर किसी भी प्रकार की टिप्पणी नहीं कर सकता हूँ ।
अब एक अन्य प्रश्न उठता है कि "आखिर इससे हो ही क्या जाएगा?" सामान्य जवाब होता है: "मन ठहर जाएगा।" या "तुम विचारों से दूरी बना लोगे।" या "तुम साक्षी बन जाओगे।"क्योंकि किसी भी वस्तु को देखने का अर्थ है कि आप उससे दूरी बनाये हुए हो अर्थात आप उससे अलग हो । यदि मैं अपने अनुभवों की बात करूँ तो साक्षी तो उस वाह्य वस्तु का कर सकते हो जिसे बस देखो और उससे संबंधित किसी भी प्रकार के स्वयं का संबंध मानसिक रूप से न बनाओं । वस्तु को देख सकते हो किंतु विचारों को नहीं देख सकते हो , क्योंकि वस्तु को देखें के बाद विचार पैदा होते हैं मन में , जिसका निर्माता पूर्ण रूप से “मैं” ही होता है ।
तो यह सिद्ध है कि विचारों को देखा नहीं जा स्काटा है । वह इसलिए भी कि देखने वाला और विचारों को पैदा करने वाला एक ही । विचारों को पैदा करना और उसे देखना एक साथ एक समय में संभव नहीं हो सकता अहि । यदि कोई यह कहता है कि स्वप्न में विचारों को देखते हैं तो वह भी गलत है क्योंकि वहाँ कहानियों में इन्वॉल्व होते हैं और उसी में विचारों की उत्तपत्ति होती अहि । और उस समय आप विचारों से भला अलग कैसे हो सकते हैं । उस समय अच्छा व बुरे विचारों में लिप्त ही होते हैं । विचारों को उस समय देख सकते ही नहीं ।
यह धारणा ही गलत है कि विचार को देखो क्योंकि वह कोई *वस्तु* हैं ही नहीं जो तुमसे पूर्ण रूप से अलग है जिसे देखा जा सकता है।
वह तो “मैं” और वस्तु के मध्य संपर्क के बाद पैदा हुआ तत्व है जो जिसे हम विचार कहते हैं । यहाँ मैं एक बिल्कुल स्पष्ट बयान देना चाहता हूँ, मैं विचारों को कोई वास्तविक वस्तु या ऑब्जेक्ट मानता ही नहीं हूँ।
इसका अर्थ क्या है? इसका अर्थ कहीं यह तो नहीं कि विचार अस्तित्वहीन हैं। नहीं इसका अर्थ यह है कि विचार *स्वतंत्र वस्तुएँ* नहीं हैं। वे किसी वस्तु के रूप में बाहर या अंदर कहीं अलग से मौजूद नहीं हैं, जिन्हें आप अपने से अलग होकर देख सकें। वह तो “मैं” के द्वारा मन से किसी वस्तु के संपर्क के बाद पैदा होती है । यदि वस्तु को हटा दो तो विचार पैदा ही नहीं हो सकते हैं ।
विचार क्या है? यह की एक गतिविधि है जो “मैं” का वस्तु से संपर्क होते ही जो मन में पैदा हुआ उसी को विचार कहते हैं । यह एक प्रकार की तरंग है जो अंतरतम में पैदा होती अहि और उससे सुख और दुख की अनुभूति होती है ।
तो प्रश्न यह है: क्या आप अपने आप को अलग होकर देख सकते हो?
यह भला कैसे संभव हो सकता है ! आप स्वयं ही तो देखने वाले हैं , तो भला आप स्वयं को कैसे देख सकते हैं । जैसे आँखें स्वयं अपनी आँखों को कैसे देख सकती हैं । जो देखने वाला है वह स्वयं को कैसे देखेगा । क्योंकि उसमें देखने की क्षमता है , और देखने का अर्थ ही है स्वयं से अलग किसी अन्य को देखना । तो आत्म दर्शन जैसे शब्दों का प्रयोग क्यों किया जाता है । यहाँ पर आत्म दर्शन का मूल अर्थ है कि स्वयं का बोध करना कि मैं हूँ ।
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