विचार — बाहर से नहीं, भीतर की रचना
“जो विचार आते हैं, आने दो; जो जाते हैं, जाने दो”—यह वाक्य सुनने में अत्यंत सरल, शांत और ध्यानपूर्ण प्रतीत होता है। अनेक गुरुओं के उपदेशों में यह वाक्य बार-बार दोहराया जाता है। पहली दृष्टि में यह सहज स्वीकार का संदेश देता है, मानो विचार कोई बाहरी वस्तु हों जो आते-जाते रहते हैं और हमें केवल दर्शक बने रहना है। परंतु दार्शनिक दृष्टि से इस कथन के भीतर एक सूक्ष्म भ्रम छिपा है, जिसे समझे बिना ध्यान की वास्तविकता तक पहुँचना संभव नहीं।
इस वाक्य में एक मौन धारणा निहित है—कि विचार बाहर से आते हैं और भीतर से चले जाते हैं, या फिर वे भीतर कहीं तैर रहे हैं और हम उनसे पृथक कोई साक्षी हैं। क्योंकि इस सिद्धांत से कि विचारों के आने जाने को बस देखते रहो का तात्पर्य तो यही दिखता है कि वह मेरे द्वारा चलाया ही नहीं जा रहा है ।
परंतु यदि हम अपने प्रत्यक्ष अनुभव की ओर ईमानदारी से देखें, तो पाएँगे कि ऐसा नहीं है। विचारों की अपनी स्वतंत्र सत्ता तो है ही नहीं । यदि ऐसा ही होता तो उसका नियंत्रण संभव ही न था । क्योंकि जिसे हम स्वयं देख रहे हैं वह हमसे पूर्णतः अलग है , और जो अलग है उस पर नियंत्रण भला कैसे संभव है । वह तो जैसे चल रहा है वैसे ही चलता रहेगा । तो यदि कोई गुरु अथवा शिक्षक यह कहता है कि बस आने और जाने वाले विचारों को देखो तो इसका मूल अर्थ भला क्या हो सकता है ।
मेरे अनुभव में मूल सत्य यह है कि विचारों को प्रत्यक्ष व अप्रत्यक्ष रूप में उत्पन्न किए जा रहे हैं। वे घटित नहीं हो रहे, वे रचे जा रहे हैं। और सबसे महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि रचने वाला स्वयं अनभिज्ञ है कि वह स्वयं ही रचनाकार है। यही तो उसका अज्ञान है—उत्पादन चल रहा है, पर उत्पादक सोया हुआ है। विचारों की निरंतर धारा इसलिए नहीं है कि वे कहीं से आ रही है, बल्कि इसलिए है कि रचना का यंत्र अनवरत सक्रिय है और उसे यह ज्ञात नहीं कि वह स्वयं उसका संचालन कर रहा है।
जिस क्षण यह बोध होता है कि “विचार मेरे द्वारा रचे जा रहे हैं,” उसी क्षण एक मौलिक परिवर्तन घटित होता है, वह है विचारों का क्षण भर के लिए बंद हो जाना । जिस पल यह ज्ञात हो जाता है कि मेरे द्वार ही पैदा किए जा रहे हैं उसी क्षण ये विचार वह स्वतः ही बंद कर डेटा है । चूँकि विचारों को पैदा करने में वह इतना अभ्यस्त है कि उसके बोध पर भारी पड़ जाता है , और परिणामस्वरूप कुछ ही पलों में वह पुनः विचारों के उत्पादन में श्रम करने लगता है । किंतु वह हार नहीं मानता , कुछ पलों के बाद उसे पुनः भान होता है कि ये तो मैंने फिर से पैदा करना शुरू कर दिया तो वह तो वह पुनः बंद कर डेटा है ।
यही प्रक्रिया को मैं बोध का अभ्यास कहता हूँ । जिसका मैं अभ्यस्त हो गया है उसे बोध के मध्यम से तोड़ देना । यह स्वतः चलने वाली प्रक्रिया है । इसमें कोई तंत्र , कोई योग , कोई प्राणायाम , कोई क्रिया और न ही कोई ध्यान की टेक्नीक की आवश्यकता है । मात्र बोध । बोध होते ही वह स्वयं विचारों का निर्माण बंद कर देता है ।
अब किसी एक स्थान पर बैठकर ध्यान में इसी का अभ्यास ही तो करना है । विचारों के आने जाने का मतलब ही नहीं रह जाता । वह जैसे ही विचार पैदा करता है , पुनः बोध होने पर स्वतः उत्पादन बंद कर देता है । इसी का अभ्यास ही ध्यान है ।
मैं इसीलिए इसे यह दमन नहीं कहता हूँ । क्योंकि इसमें दमन की कोई प्रक्रिया ही नहीं , बस अपनी भूल को बार बार याद भर करना है , याद होते ही सुधारने की क्रिया शुरू हो जाति है । यह स्वाभाविक विराम है। जैसे ही स्पष्टता आती है, रचना स्वतः शिथिल पड़ती है।
अब यह कहने की आवश्यकता नहीं है कि विचारों को आने दो और जाने , जैसे आ रहे हैं आने दो और जैसे जा रहे हैं वैसे ही जाने दो । ये सब महत्वहीन हो चुका है ।
मेरे अनुभव में यहीं से स्वास्थ्य का वास्तविक अर्थ प्रकट होता है जहाँ कोई कर्म नहीं , जहाँ कोई प्रयत्न ही नहीं , बस बोध को बार बार जगाना मात्र है । स्वास्थ्य केवल शरीर की अवस्था नहीं, बल्कि स्वयं में स्थित होने की अवस्था है। जब विचारों की अनजानी रचना रुकती है, तब मन अपनी ही गति से मुक्त होता है। यह मौन किसी प्रयास का परिणाम नहीं, बल्कि समझ व बोध का फल है। समझ के साथ ही विचारों का प्रवाह अनावश्यक हो जाता है, क्योंकि अब वे अचेतन उत्पादन नहीं रहे।
आध्यात्मिक साधना का सार इसी बोध को निरंतर बनाए रखने में है। सजगता का अर्थ विचारों को दबाना नहीं, न ही उनसे भागना है; बल्कि यह देखना है कि उसे आने दो जाने दो जो कि असंभव है । जब यह स्पष्ट होता रहता है कि “मैं ही रच रहा हूँ,” तब रचना की गति स्वतः संयत हो जाती है। इस सजगता में मन बाहर भटकता नहीं, भीतर ठहरता है। और उसी ठहराव में वह शांति जन्म लेती है जिसे हम ध्यान, समाधि या आत्मस्थिति कहते हैं।
अतः विचारों को आने-जाने देने का उपदेश अधूरा है, यदि उसमें रचनाकार की पहचान न जोड़ी जाए। वास्तविक ध्यान विचारों के प्रवाह को सहने का अभ्यास नहीं, बल्कि उनकी उत्पत्ति के स्रोत को जानने का साहस है। जब स्रोत जाना जाता है, तब प्रवाह अपना अर्थ खो देता है। और वहीं से आत्मज्ञान की यात्रा आरंभ होती है।
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