शवासन & योगनिद्रा (Teacher Training Course)
सोते समय जगना (स्वप्न) और जगते समय सोना (उबासियाँ) । अब तो इसकी आदत सी बन गई है । सुबह उठते हैं तो लगता ही नहीं कि सो करके उठा हूँ । नींद में सब कुछ छोड़ दिया था , इसका सुबह उठकर एहसास भी नहीं होता है । लगता है यही नियति बन गई है ।
सो करके उठने के बजाय न सो करके उठा कहना ही बेहतर होगा । उठते के पहले ना उठने का मन करना , और लेटे रहने की ज़िद्द , कुछ समय तक बिस्तर को रौंदते रहने की मन निरंतर करता रहता है । किसी तरह से जेहाद करके उठते ही बस अपनों को जो पहले से ही मेरी तरह उठे हुए हैं उन्हें गुड मॉर्निंग और राधे-राधे, राम-राम, जय हो लक्ष्मी जी जैसे पवित्र वाक्यों से व्हाट्स एप के माध्यम से सींचना शुरू कर देना मेरे लिये बहुत ही सुखद महसूष होता है ।
न सो पाने की कमी को इन्ही सब वाक्यों और शुभ कथनों से पूरा कर ही लेते हैं । अंतरात्मा को इक्षा करती है कि अपने अस्तित्व को कि मैं हूँ इस संसार में, प्रतिदिन व्हाट्स ऐप के माध्यम से फेकते रहो , मतलब बताते रहो कि मैं ज़िंदा हूँ और साथ में ख़ुश भी हूँ । हर एक दिन सुबह सुबह यह कहना कि मैं ज़िंदा हूँ ठीक नहीं है इसीलिए शुभ वाक्यों को भेज देता हूँ । यह जनता हूँ कि शुभ वाक्यों को तो कोई फॉलो करेगा नहीं , किंतु इसके माध्यम से मुझे तो याद करेगा । उन सभी अपने जो मेरी ही तरह सभी को व्हाट्स ऐप से पवित्रता फैला रहे हैं, जो मेरी ही तरह सोये नहीं, अभी समाज में जन्नत जाने का प्रचार कर रहे हैं ताकि वहाँ भी शांति मिल जाये ।
अब स्नान करने जाना है , किंतु मुझे समय की बर्बादी बर्दाश्त नहीं होती है इसलिए स्नान के समय भी कुछ मंत्रों का उच्चारण कर लेते हैं जिससे परम-आत्मा से रात में न जुड़ पाने की कमी समाप्त हो जाती है । आख़िर मैंने जो आदत बना रखी है , उसी तरह तो करना है । जैसे नहाते समय नहाने के बजाय मंत्रों उच्चारण करना , कुछ वैसे जैसे सोते समय जागना और जागते समय सोना । जैसे ऑफिस में बैठकर कंप्यूटर पर तास खेलना । जो जिस समय करना है उसे न करने की आदत हमने कमाल की बना रखी है । बजाय कि पॉटी की सीट पर बैठकर पॉटी करने के मोबाइल देखते रहना । क्या ग़ज़ब है ना !
आख़िर अब समय आ ही गया प्रातः क़ालीन भोजन के निगलने का । यहाँ पर भी वही आदत कि जो कार्य कर रहे हो उस समय उसे अनुभव न करते हुए किसी दूसरे कार्य पर निरंतर चिंतन करना । भोजन करते समय , समय का दुरुपयोग ना करते हुए ऑफिस से संबंधित कार्यों पर चिंतन में संलग्न हो जाना कितना सुखदायी लगता है ।
अंततः वही ढाक के तीन-पात ऑफिस पहुँच कर उबासियों के दौरे पड़ना शुरू हो जाना , नींद के प्रलय का आना शुरू हो जाना । आख़िर आदत जो हो गई है कि कार्य को करते समय किसी अन्य कार्य पर चिंतन करना । इसीलिए मन मस्तिष्क भी सोते समय जगाता है और जागते समय सोता है ।
सत्य तो यह है कि सोने के पहले सोने का अभ्यास नहीं किया और न जगते समय जागने का अभ्यास । इसी से जो जो समस्याएँ पैदा होती हैं उस पर दार्शनिक, आनुभविक और व्यावहारिक चर्चा किया जाएगा तथा साथ साथ अभ्यास कैसे किया जाये इस पर बल दिया जायेगा ।
इस पद्धति से रोगों के निवारण पर चर्चा और अभ्यास किया जाएगा -
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