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शून्य: मंत्र में विश्राम का दर्शन

1 month ago By Yogi Anoop

शून्य से उत्पत्ति: मंत्र, धड़कन और विश्राम का दर्शन

चाहे वह मंत्र हो या हृदय की धड़कन—इन दोनों की यात्रा का प्रारंभ शून्य से ही हुआ । यहाँ शून्य का अर्थ पूर्ण रूप से कुछ नहीं व अभाव नहीं है, बल्कि विश्राम है; वह अवकाश है जहाँ गति जन्म लेने से पहले ठहरती है। हृदय की धड़कन को ही लें—यदि औसतन वह एक मिनट में बहत्तर बार धड़कता है, तो उतनी ही बार वह विश्राम भी लेता है। प्रत्येक धड़कन के बीच एक सूक्ष्म विश्राम है, एक अति क्षणिक विश्राम, जहाँ हृदय स्वयं को पुनः संतुलित करता है। यदि वह रुकना न हो, तो धड़कन संभव ही नहीं हो सकती। इस दृष्टि से देखें तो धड़कन का जन्म भी विश्राम से ही होता है—पहले रेस्टिंग, फिर स्पंदन। 

यही सिद्धांत मंत्र में भी कार्य करता है। माला के एक सौ आठ मनकों को यदि ध्यान से देखा जाए, तो उतने ही रिक्त स्थान भी वहाँ उपस्थित हैं। जितने मनके उतने ही हैं शून्यताएँ (रिक्त स्थान)। पर मंत्र साधक की दृष्टि प्रायः मनकों पर ही टिक जाती है, रिक्तता व विश्राम अदृश्य रह जाती है। जबकि वास्तव में मंत्र की साधना शब्द से नहीं, शब्दों के बीच के निःशब्दता व ठहराव से परिपक्व होती है। 

जब कोई साधक मंत्र-जप में उँगलियों के साथ माला का प्रयोग करता है, तो मंत्र का उच्चारण एक अत्यंत अल्प क्षण में घटित होता है, पर उँगलियों का रुकना—उस मनके के पास ठहरना—अधिक समय लेता है। वही रुकना, वही ठहराव, वही अवकाश ही साधना का वास्तविक केंद्र है। शब्द तो केवल संकेत है, विश्राम उसकी आत्मा है।

यदि इसे एक सरल उदाहरण से समझें—मान लें कि बीज मंत्र “राम” एक मनका है। दो मनकों के मध्य जो रिक्त स्थान है, वही मन का विश्राम है। “राम” शब्द के उच्चारण के बाद मन जहाँ रुकता है, वही रिक्तता है। वही स्थान ‘न्यास’ है। मन शब्द को मनके से जोड़ता है और शब्द के समाप्त होते ही उत्पन्न हुई शांति को दो मनकों के बीच की शून्यता में पिरो देता है। इस प्रकार साधक का मन एक बार गति का अनुभव करता है—“राम”—और एक बार विश्राम अर्थात् आराम का—रिक्तता, शून्यता । 

यह प्रक्रिया केवल मंत्रोच्चार नहीं है, यह मन को चलना और विश्राम—दोनों का बोध कराना है। यदि मन केवल शब्द में उलझा रहे, तो वह थक जाता है; यदि वह शब्द के बाद के निःशब्द में उतर जाए, तो विश्राम को भी अनुभव कर लेता है। यही मंत्र सिद्धांत का मूल होना चाहिए—शब्द से अधिक महत्व शून्य का, ध्वनि से अधिक मूल्य मौन का। ताकि स्मृति में शब्दों के बाद निःशब्द की भी अनुभूति बनी रहे । 

सामान्यतः मन शब्दों के माध्यम से स्वयं को बाँधे रहता है , और उन्ही शब्दों के माध्यम से भाव रसों को निकालता रहता है । उसी में प्रसन्न रहने की कोशिश करता है । उसे यह लगने लगता है कि यही प्रसन्नता का मूल स्रोत है किंतु उसे उसके लिए शब्द रहित अवस्था की अनुभूति कर पाना अकल्पनीय जैसा लगता है । 

जब वास्तव में मंत्र का मूल उद्देश्य मन को शब्दों में बाँधना नहीं, शब्दों का उपयोग करते हुए उसे विश्राम से परिचित कराना है। जब वह विश्राम की अनुभूति कर लेता है तब शब्दों को त्यागना बहुत सरल हो जाता है ।  जबकि सामान्य मनुष्य मन को जीवन भर रोकने का प्रयत्न करता है पर सफल नहीं होता वह इसलिए क्योंकि मन को रोकना नहीं सिखाया जा सकता है , क्योंकि रोकने में शक्ति अनावश्यक रूप से खर्च हो जाती , मन को विश्राम सिखाना है । उसमें मन को दो तरह से शांति मिल जाती । एक शब्दों के माध्यम से भाव मिलते हैं दूसरे शब्द रहित व निःशब्द के माध्यम भावरहित अवस्था की अनुभूति हो जाती है । 

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