शनि ग्रह का आध्यात्मिक और दार्शनिक रहस्य !
शनि की पूजा को लेकर समाज में एक गहरी भ्रांति व्याप्त है। सामान्य धारणा यह बना दी गई है कि शनि भय का ग्रह है और उस भय से मुक्ति पाने के लिए बाहरी अनुष्ठान, तेल, काले वस्त्र, तिल, फूल-माला और विशेष पूजन आवश्यक हैं। परंतु शनि का वास्तविक स्वरूप न तो भय पैदा करने वाला है और न ही किसी बाहरी तुष्टि से प्रसन्न होने वाला। शनि का संबंध कर्म से है—उस कर्म से जिसे मनुष्य टालता है, अधूरा छोड़ देता है या असमान भाव से करता है। शनि भय नहीं देते, शनि उस भय को सामने लाते हैं जो मनुष्य अपने कर्मों से बचने के लिए भीतर छिपाए बैठा होता है। और वही भय अंततः मनुष्य को निर्वृत्ति, परिपक्वता और समत्व की ओर ले जाता है।
यह श्लोक—
शनि: पन्थाः शनि: कन्था शनि: पर्वतमस्तके।
शनि: विद्या शनि: वित्तं पश्चात्तापि शनि: शनि:॥
—शनि के इसी गूढ़ दार्शनिक और आध्यात्मिक स्वरूप को उद्घाटित करता है। यहाँ शनि किसी ग्रह विशेष से आगे बढ़कर जीवन के एक सिद्धांत के रूप में प्रकट होते हैं।
शनि: पन्थाः—शनि कोई व्यक्ति नहीं बल्कि वह मार्ग है जो शीघ्र नहीं है, सरल नहीं है, बल्कि धैर्य, निरंतरता और उत्तरदायित्व से भरा हुआ है। शनि का पथ मनुष्य को यह सिखाता है कि जीवन परिणाम से नहीं, प्रक्रिया से बनता है। जो व्यक्ति परिणाम के लोभ में कर्म को छोटा कर देता है, वह शनि से टकराता है अर्थात् वह उस स्थिरतम अनुभव से वंचित हो जाता है । और जो व्यक्ति कर्म में अकर्म का अनुभव कर लेता है वह पूर्णता से जीवन को जी लेता है, उसके लिए शनि बाधा नहीं, आधार बन जाते हैं। शनि का अर्थ ही है बाधा और उस बाधा में ही तो जीवन का अनुभव संभव है । इसके बाद ही शनि पथ को निष्कंटक कर देता है । किंतु यदि उस प्रसन्नता में कर्म के मूल रहस्य को भूले तो वही पुनः दुख के रूप में आता है ।
शनि: कन्था—शनि का वस्त्र कन्था है, फटा-पुराना। यह निर्धनता का नहीं, बल्कि सादगी और अहंकार-रहित जीवन का प्रतीक है। उसका ध्यान वेश भूषा पर उतना नहीं है जितना कर्म की माहीन जानकारी प्राप्त करने की । शनि का अर्थ ही है परिणाम में नहीं बल्कि कर्म जो वर्तमान में घटित हो रहा है उस पर ध्यान दो । वह रंग में काला भी है । इसलिए कि उसमें कुछ दिखता नहीं । पर इसका अर्थ यह नहीं कि उसमें वस्तु नहीं । अंधेरा होने का अर्थ यह तो नहीं कि वस्तु की सत्ता समाप्त हो गई । उस काले का अर्थ यह भी तो कि उस कर्म में अकर्म का अनुभव कर लो ।
शनि: पर्वतमस्तके—शनि पर्वत-शिखर पर स्थित हैं। जैसे मानो कर्म के बाद अकर्म की कल्पना करना असंभव है । वह मात्र कल्पना करना ही है । शिखर तक पहुँचने का मार्ग कठिन होता है, लंबा होता है और कई बार एकाकी भी। अकेला कर देता है । शनि यहाँ यह स्मरण कराते हैं कि ऊँचाई केवल वही पा सकता है जो भार उठाने की क्षमता तो रखता है किंतु उत्तरोत्तर विकास करते हुए भार से आभार की ओर बढ़ जाता है । अर्थात पर्वत पर चढ़ने के लिए भार हटा देता है । धैर्यवान व्यक्ति ही दीर्घकालिक सुख और स्थिर जीवन जी पाता है। जो जल्दी ऊपर पहुँच जाता है, वह अक्सर भीतर से अधपका रह जाता है—और वही अधूरापन आगे चलकर असंतोष बनता है।
शनि: विद्या—वास्तविक विद्या वह नहीं जो केवल बुद्धि और मानसिक कौशल मात्र हो । बल्कि वह जो कर्म में व्यवहार के माध्यम से स्वभाव को परिष्कृत करे। यह विद्या अनुभव से आती है, संघर्ष से आती है, और समय के साथ भीतर उतरती है। शनि (धैर्य पूर्वक कर्म) की विद्या मनुष्य को तोड़ती नहीं, गढ़ती है—पर गढ़ने की प्रक्रिया में प्रतीक्षा अनिवार्य है।
शनि: वित्तं—स्थायी संपन्नता भी शनि (समता) के अनुशासन से ही आती है। शीघ्र लाभ आकर्षक होता है, पर टिकाऊ नहीं। शनि यह सिखाते हैं कि धन कमाते कमाते एक अनुभव ऐसा आता है जब आप अंतर्मन से संतुष्ट हो जाते हैं । आपको यह अनुभव हो जाता है कि धन चलायमान है यह स्थिर नहीं हो सकता , स्थिरता मुझे चाहिए । । यही शनि की चरम अवस्था है । यही सबसे बड़ा वित्त भंडार है । जो बिना समय दिए सब कुछ चाहता है, वह अंततः सब कुछ खो देता है।
पश्चात्तापि शनि: शनि:—पश्चात्ताप, आत्म-मंथन और सुधार की प्रक्रिया भी शनि के ही माध्यम से होती है। शनि दंड नहीं देते, शनि अवसर देते हैं—अपने कर्मों को देखने, स्वीकार करने और उनमें परिवर्तन लाने का अवसर। प्रकृति दंड नहीं देती है क्योंकि उसमें ज्ञान नहीं है । दंड तो मनुष्य को स्वयं ही देता है अपने ऐक्षिक कर्मों के माध्यम से किंतु उसे जल्दीबाजी के कारण बोध नहीं होता है । पश्चाताप का अर्थ यही नहीं कि वह अपने कर्मों पर रोए बल्कि धैर्य और धीमापन (शनि) यह अवसर देता है कि उसी धीमापन में सोचने का समय निकालो , आत्म चिंतन करो कि उसे n किया जाये जिसे करने में कष्ट होता है । अर्थात शनि जो धीमापन का प्रतीक है यह अवसर दे रहा है कि रुको देखो और फिर चलो । बहुत तेजी से न भागो ।
अंततः शनि का संदेश अत्यंत स्पष्ट है—कर्म से भागो मत, कर्म को सजाओ मत, कर्म में असमान मत हो। कर्म में निरंतरता, अनुभव और सीख ही स्वभाव को परिपक्व बनाते हैं। कर्म इतना आराम आराम से करो कि कर्म में अकर्म का अनुभव हो जाये और धन भी प्राप्त हो जाये । हुआ न शनि का दिया हुआ दोहरा लाभ ।
जिस जीवन में सब कुछ जल्दी मिल जाता है, वहाँ स्वयं ग़ायब हो जाता है और स्वयं के खो जाने से कितने दुख होते हैं आप कल्पना नहीं कर सकते । यदि इसे प्रत्यक्ष देखना हो तो किसी दिन शनिवार के दिन किसी मंदिर में जा करके देखें कि कष्ट कितना अधिक है ।
मेरे अनुभव में शनि की वास्तविक पूजा किसी शनिवार को किए गए अनुष्ठान में नहीं, बल्कि हर दिन किए गए कर्म में समता में है। सम रहना ही शनि की पूजा है।
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