साधना, प्रकृति और मूर्खता
(अनैक्षिक वृत्तियों को रोकने की ज़िद योग नहीं है)
मनुष्य की सबसे पुरानी इच्छा यह रही है कि उसकी कोई बुराई न करे। या यूँ कहें कि इसके पीछे का छिपा मंतव्य यह है कि उसकी महानता की चर्चा सब करें , उसकी बड़ाई सब करें । यह इच्छा जितनी भोली दिखती है, उतनी ही गहरी भ्रांति से भरी हुई है। क्योंकि जिस दिन मनुष्य यह चाहता है कि संसार उसकी अपेक्षाओं के अनुसार चलने लगे, उसी दिन उसने स्वयं को संसार से अलग मान लिया। और यहीं से दुख का बीज पड़ता है।
अक्सर लोग पूछते हैं—क्या कोई ऐसी साधना है जिससे कोई हमारी बुराई न करे? इस प्रश्न में ही यह मान लिया गया है कि समस्या बाहर है, और समाधान भीतर नहीं। मेरे पास ऐसी कोई साधना नहीं है जो दूसरों की दृष्टि व मानसिकता को नियंत्रित करना सिखाता हो । किंतु मैंने उस स्थान पर अवश्य कार्य किया है जहाँ से मेरी पीड़ा उत्पन्न होती है—मेरी अपनी ऐच्छिक वृत्तियाँ।
ऐच्छिक वृत्तियाँ वे मानसिक प्रवृत्तियाँ हैं जिन्हें मैंने स्वयं जन्म दिया है। जैसे मन में विचार आया कि कुछ चटर-पटर खाया जाए। खाली बैठे हैं, वातावरण अच्छा है, तो समोसे, रसगुल्ले, आइसक्रीम क्यों न खाई जाए; मनोरंजन के लिए कोई मूवी देख ली जाए। खाली बैठे हैं दूसरों के बारें में विचार ही कर लिया जाये । ये सब विचार मेरे द्वारा उत्पन्न हैं, मेरी कल्पना की उपज हैं वह इसलिए कि मेरे पास बहुत समय है । इन्हें ही रोका जा सकता है, बदला जा सकता है, और चाहें तो धीरे-धीरे इनसे मुक्त भी हुआ जा सकता है।
समस्या तो वहाँ शुरू होती है, जहाँ मनुष्य यह मान बैठता है कि वह उन वृत्तियों को भी नियंत्रित कर सकता है, जिन्हें उसने पैदा ही नहीं किया। जिसका उन विचारों व घटनाओं के पैदा होने में कोई भूमिका है ही नहीं । गला सूखता है और पानी की माँग करता है, पेट भोजन की सूचना देता है, भूख सिरदर्द और चिड़चिड़ेपन में बदल जाती है, छींक अपने समय पर आने को आतुर होती है, और भरा हुआ ब्लैडर बाहर निकलने का स्वाभाविक मार्ग खोजता है। ये वृत्तियाँ मनुष्य मन द्वारा निर्मित नहीं हैं , ये दैहिक प्रकृति की घोषणाएँ हैं। ये स्वतः ही संकेत दे रही होती हैं । इनको समाप्त नहीं किया जा सकता है ।
इन्हें दबाना साधना नहीं, साधना में तो प्रकृति के प्रकृति को ही समझा जाता है , और उस प्रकृति को समझते समझते समझने वाले का स्वयं में बोध हो जाता है ।
किंतु समस्या तब उत्पन्न होती है जब हमारा मन अनैक्षिक वृत्तियों को ही नियंत्रित कर लेने को ही साधना समझने लगता है । कुछ लोग तो इन्हीं अनैच्छिक वृत्तियों को रोकने को ही योग समझ लेते हैं। कोई शौच, मूत्र, भूख, प्यास को जीत लेने को सिद्धि कहता है; कोई शरीर को उल्टा-पुल्टा कर प्रकृति को चकमा देने को ज्ञान मान लेता है। यह योग नहीं है, यह मूर्खता है—और वह भी आध्यात्मिक वेश में छिपी हुई मूर्खता। ऐसे लोग दूसरों को मूर्ख नहीं बनाते; वे स्वयं अपने भ्रम के सबसे बड़े शिकार होते हैं।
योग, ध्यान और अध्यात्म की उत्पत्ति इसलिए नहीं हुई कि मनुष्य प्रकृति से युद्ध करे। उनकी उत्पत्ति इसलिए हुई कि मनुष्य यह समझ सके कि कहाँ हस्तक्षेप करना है और कहाँ नहीं। योग यह सिखाता है कि अनैक्षिक रूप में घट रहा है, उसे घटने दो; उसे समझो उसका बोध करो । और जिन वृत्तियों को तुमने पैदा किया है उसे समझकर मार दो । मेरा तो अनुभव है कि उस अनैक्षिक प्रकृति को समझते समझते इतनी गहन शांति प्राप्त होती है कि ऐक्षिक प्रवृत्तियों का समापन बहुत आसानी से होने लगता है ।
तर्क सीधा है—जो स्वभावगत है, उसका स्वभाव बदला नहीं जा सकता। आग का जलाना, पानी का बहना और शरीर का संकेत देना—ये सब अपरिवर्तनीय हैं। किंतु जिन मानसिक आदतों, इच्छाओं और कल्पनाओं को हमने अपना स्वभाव मान लिया है, वे स्वभाव नहीं हैं, वे स्वनिर्मित संस्कार व आदत है। और संस्कार बदले जा सकते हैं, देखे जा सकते हैं, छोड़े जा सकते हैं।
सच्ची साधना शरीर को दबाने में नहीं, भ्रम को पहचानने में है। योग का आरम्भ वहाँ नहीं होता जहाँ व्यक्ति प्रकृति को जीतने की घोषणा करता है, बल्कि वहाँ होता है जहाँ प्रकृति को समझ लेता है । प्रकृति को समझना ही सबसे बड़ी विजय है। और जिस दिन यह समझ आ जाती है, उसी दिन बुराई करने वाले भी उतने महत्त्वपूर्ण नहीं रह जाते—क्योंकि भीतर कोई ऐसा बचा ही नहीं होता जिसे चोट लगे।
यही वास्तविक योग है। बाकी सब करतब हैं।
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