प्रश्न: क्या सांसों पर अधिक एकाग्रता भी हानिकारक हो सकती है?
प्रश्न सुनने में विरोधाभासी प्रतीत होता है, क्योंकि सामान्य बुद्धि यही मानती है कि जितनी गहरी एकाग्रता, उतनी ही श्रेष्ठ साधना और उतना ही अच्छा स्वास्थ्य । किंतु मैं अपने सूक्ष्म अनुभवों से देखूँ तो उत्तर स्पष्ट है—हाँ, अति एकाग्रता भी उतनी ही हानिकारक हो सकती है जितना उसका अभाव। यह विरोधाभास नहीं, बल्कि साधना के उस मध्यम मार्ग का संकेत है, जिसे भारतीय चिंतन-परंपरा ने सदियों से सम्हाला है।
जब मन के द्वारा एकाग्रता को शरीर और श्वास पर बलपूर्वक थोपा जाता है—भौंहों में खिंचाव देकर, साँस को अनावश्यक रूप से रोककर, या "किसी भी कीमत पर ध्यान लगाना है" की ज़िद के साथ—तो मन के साथ साथ उसके द्वारा उपयोग में लाये गए इन्द्रियों और देह के सूक्ष्म अंगों में भी उस दबाव के विरुद्ध प्रतिक्रिया होने लगती है । यद्यपि यह कहा जाता है कि यह एकाग्रता धीरे धीरे होनी चाहिए किन्तु मेरे अनुभवों में बलपूर्वक एकाग्रता ख़तरनाक होती है लंबे समयावधि के लिए । यह ठीक वैसा ही है जैसे मुट्ठी में बालू को कसकर पकड़ने का प्रयास करना; जितना दृढ़ता से पकड़ेंगे, उतनी ही तेज़ी से वह उँगलियों के बीच से फिसलता जाएगा। मन भी बालू की भाँति है—पकड़ने के आग्रह से वह और अधिक बिखर जाता है। परिणाम होता है तनाव, थकान, चिड़चिड़ापन, स्मृति में दोष , रक्त के दबाव का बढ़ना, सिर का हमेशा भारी रहना , मूड स्विंग का होना और कई बार गहरा मानसिक असंतुलन भी जिसमें अवसाद और भ्रम इत्यादि सम्मिलित होता है ।
योग-परंपरा में इस अति को "हठ" या हठ योग कहा गया है—बलपूर्वक की गई साधना, जिसमें अपनी कर्मेन्द्रियों और ज्ञानेन्द्रियों के हिस्सों पर मन को जबरन एकाग्र करवाने का प्रयत्न किया जाता है । मन के द्वारा बल व प्रयत्न में बहुत अति जब की जाती है तब कर्ता भाव जगता है । कर्ता के भाव को जगाने के लिए ये बलपूर्वक अभ्यास किया जाता है । यह इसलिए कि कर्तापन में व्यक्ति को स्वयं में शक्ति संपन्न होने का अनुभव होता है । यही शक्ति का अनुभव उसे अहंकारी भी बनाने लगती है । जब कि इसके ठीक विपरीत छोर पर है शिथिलता और प्रमाद, जहाँ मन बिखरा हुआ, आलसी और दिशाहीन बना रहता है।
मेरा अनुभव दर्शन इन दोनों अतियों के बीच एक तीसरा, सूक्ष्म मार्ग दिखाता है। उसमें योगसूत्र के उस आसन की परिभाषा —"स्थिरसुखमासनम्"—के मूल को प्राणायाम ही नहीं बल्कि प्रत्येक साधन में लागू कर दिया ।
एकाग्रता भी तभी प्रामाणिक है जब उसमें स्थिरता और सहजता दोनों साथ-साथ विद्यमान हों। जहाँ स्थिरता की अपेक्षा तो हो किंतु उसकी प्राप्ति के लिए अति-तनाव की साधना अपनाया जाये तो वह कहाँ से सम्भव होगा । इसीलिए मैं साधना में किसी भी प्रकार के हठ को नहीं स्वीकारता हूँ क्योंकि मैंने इसके दुष्प्रभाव को स्पष्ट तौर पर स्वयं के देह और मन पर देखा है ।
यद्यपि यह मध्यम दृष्टि केवल भारतीय योग-परंपरा में सदियों से है किंतु समस्या यह है कि प्रारंभ में अभ्यस्त अपनी एकाग्रता के माध्यम से देह और मन में गर्मी पैदा करने लगता है , वह साधना को कुछ और समझ लेता है, परिणामस्वरूप दुष्परिणाम को भुगतना पड़ता है । मैंने अपने इसी अनुभव को श्वसन की क्रिया भी भलीभाँति अपनाया । और तंत्रिका तंत्र को ठीक करने कामयाबी प्राप्त किया । तंत्रिका तंत्र को विश्राम की अवस्था (पैरासिम्पैथेटिक) में गया और बजाय संघर्ष की अवस्था (सिम्पैथेटिक) में प्रवेश करने के बहुत गहरे मानसिक विश्राम को प्राप्त किया । जिससे न केवल नींद बल्कि अनेक समस्याएं स्वतः ही ठीक होने लगीं ।
मूल प्रश्न है—सही एकाग्रता कैसी हो? उत्तर है: विवेकपूर्ण, धैर्यवान, और स्वीकृति-सहित। जब बुद्धि के द्वारा मन को धीरे-धीरे, बिना संघर्ष के किसी एक बिंदु पर स्थिर किया जाने लगता है, तब वही एकाग्रता क्रमशः ध्यान में परिणत होती है। पर जब उसे अतिउत्साह, महत्वाकांक्षा अथवा अनुशासन की कठोरता से खींचा जाता है, तब मन इंद्रियों और देह के सूक्ष्म अंगों पर अनावश्यक खिंचाव डालकर रोग और बोझ उत्पन्न कर देता है। साधना तब लक्ष्य से भटककर स्वयं ही समस्या बन जाती है।
— योगी अनूप
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