प्राणायाम के विज्ञान में “साँसों को जीतना” सुनने में जितना आकर्षक लगता है, उसका अर्थ उतना ही ग़लत भी समझ लिया गया है। सामान्यतः इसे शारीरिक विजय मान लिया जाता है—मानो साँस को दबा लिया जाए, रोक लिया जाए, या किसी तकनीक से वश में कर लिया जाए। किंतु यह समझ स्वयं में अधूरी है। साँस पर ज़ोर डालना, उसे नियंत्रित करने का प्रयास करना, वास्तव में अभी भी कर्ता बने रहने का सूक्ष्म आग्रह है। वहाँ “मैं कर रहा हूँ” का भाव बना रहता है, और जहाँ कर्तापन है, वहाँ विजय केवल भ्रम हो सकती है, सत्य नहीं।
साँसों को जीतने का वास्तविक अर्थ साँस पर अधिकार स्थापित करना नहीं है, बल्कि साँस के मूल अनैच्छिक स्वभाव का बोध हो जाना है। साँस अपने आप आती है, अपने आप जाती है। जन्म से मृत्यु तक वह बिना पूछे चलती रहती है। जब मनुष्य इस तथ्य को गहराई से अनुभव करता है कि साँस किसी आदेश से नहीं, किसी इच्छा से नहीं, बल्कि प्रकृति की अंतर्निहित व्यवस्था से चल रही है, तब यह बोध केवल श्वास-प्रश्वास तक सीमित नहीं रहता। साँस के माध्यम से सम्पूर्ण प्रकृति का दर्शन होने लगता है—पंचतत्त्वों की उस निरंतर गति का, जो बिना किसी प्रयास के, बिना किसी कर्ता के, निरंतर प्रवाहित होती रहती है।
प्राणायाम इस अनैच्छिक गति को रोकता नहीं। वह केवल देखने की क्षमता देता है। वह यह स्पष्ट करता है कि जो स्वयं स्थिर है, वही स्वयं को गतिमान समझ बैठा था। जैसे कोई नदी के किनारे खड़ा व्यक्ति यदि बहते पानी को बहुत देर तक देखे, तो उसे क्षण भर को यह भ्रम हो सकता है कि वह स्वयं बह रहा है।उसमें गति हो रही है । उसका सिर थोड़ी देर के लिए घूम सा जाता है । किंतु जैसे ही वह दृष्टि बदलता है, वैसे ही यह स्पष्ट हो जाता है कि गति नदी में है, उसमें नहीं। ठीक यही बात साँसों के साथ घटती है। साँस की गति को देखने से “मैं” को यह अनुभव होने लगता है कि मैं स्वयं गति नहीं हूँ—मैं तो उस गति का साक्षी हूँ।
यहीं से साँसों की तथाकथित विजय का जन्म होता है। अब साँस की गति “मैं” को अस्थिर नहीं करती। तेज़ साँस आए या धीमी, गहरी हो या उथली—उससे भीतर कोई कम्पन नहीं उठता। और साथ ही, यह भी स्पष्ट हो जाता है कि “मैं” साँसों के स्वभाव को बदल भी नहीं रहा हूँ। साँस वही करती है जो उसे करना है; अंतर केवल इतना है कि अब उससे संघर्ष समाप्त हो गया है।
इसी अवस्था को प्रतीकात्मक रूप से कहा गया है—शेर को नियंत्रित कर लिया गया। शेर मरा नहीं है, उसकी शक्ति छीनी नहीं गई है, किंतु अब उसका भय समाप्त हो गया है। उसकी उपस्थिति अब आतंक नहीं जगाती। वह वहीं है, पूरी शक्ति के साथ, पर अब दुख का कारण नहीं बनता। साँस भी ठीक ऐसी ही है—शक्तिशाली, अनियंत्रित, पर अब भयहीन।
अतः प्राणायाम में विजय साँस की नहीं होती। साँस तो वही रहती है—आती-जाती, चलती-रुकती। विजय उसकी होती है जो कर्ता से मुक्त होकर अकर्ता की अनुभूति में स्थिर हो जाता है। वही सच्चा विजयी है, क्योंकि अब न साँस उसे बाँधती है, न गति उसे विचलित करती है। वहीं से प्राणायाम शरीर का अभ्यास न रहकर अस्तित्व का दर्शन बन जाता है।
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