प्राणायाम की साधना में एक प्रश्न बहुत साधारण प्रतीत होता है, परंतु वही प्रश्न साधक को या तो गहराई में ले जाता है, या उसे पूरे जीवन सतह पर ही भटकाए रखता है—
साँसों को छोड़ना है, या साँसों को निकालना है ?
अधिकांश लोग इस अंतर को केवल भाषा का अंतर मान लेते हैं। किंतु योग-प्राणायाम का विज्ञान भाषा से नहीं, अनुभव से चलता है। और जहाँ अनुभव अनुपस्थित होता है, वहाँ प्राणायाम केवल एक शारीरिक व्यायाम बनकर रह जाता है—जिससे न मन शुद्ध होता है, न चेतना स्थिर होती है, और अंततः देह भी स्थायी आरोग्य को प्राप्त नहीं कर पाती ।
जब हम कहते हैं “साँस निकालो”, तो इस शब्द के भीतर एक सूक्ष्म रूप से प्रयत्न छिपा होता है। अर्थात् आप कुछ प्रयास कर रहे हैं । निकालना शब्द में प्रयत्न छिपा है ।
उदाहरण के रूप में—जैसे बाल्टी से पानी निकालना। कुएँ से पानी निकालना । वैसे ही प्राणायाम में साधक फेफड़ों से हवा निकाल रहा होता है । जब कि इस निकालने में प्रयास लग रहा होता है । प्रारंभिक अभ्यास में तो यह सिद्धांत लागू हो सकता है किंतु जीवन पर्यंत तक यह अभ्यास नहीं चल सकता ।
इस अभ्यास में कर्ता भाव है। इसमें मैं कर रहा हूँ की भाव है। मैं प्रयत्न कर रहा होता है । यदि कुछ वर्षों तक सतत प्रयत्न चलता रहता है तो फेफड़ों में अपना स्वभाव जो कि छोड़ने का है , वह खोने सा लगता है ।
प्राणायाम में जब साधक साँस निकालता है, तो अनजाने में वह फेफड़ों पर आदेश थोपने लगता है। पेट को खींचता है, छाती को दबाता है, मांसपेशियों को अति-सक्रिय करता है। बाहर से देखने पर यह श्वास-प्रश्वास सही लग सकता है, पर भीतर एक संघर्ष चल रहा होता है। यह संघर्ष ही धीरे-धीरे मानसिक तनाव, चिड़चिड़ापन और आध्यात्मिक असंतोष को जन्म देता है।
इसके विपरीत, “साँस छोड़ना” एक बिल्कुल भिन्न आयाम खोलता है। छोड़ना—जैसे मुट्ठी खोल देना। फेफड़े का स्वभाव लेना और छोड़ना है न कि लेना और निकालना । यह फेफड़ा सांसों को लेने में थोड़ा प्रयत्न करता है किंतु छोड़ें में भला कैसा प्रयत्न , कैसी लड़ाई । जैसे भोजन अंदर लेते हैं , थोड़ा प्रयत्न करते हैं , किंतु पॉटी व पेशाब को छोड़ने में कैसा प्रयत्न । पॉटी और पेशाब को यह देह स्वतः ही छोड़ देता है । छोड़ें की प्रक्रिया स्वाभाविक और बिना प्रयत्न के ही होनी चाहिए ।
इसीलिए छोड़ने में कोई कर्तापन की अनुभूति होती ही नहीं । ग्रहण करने में कर्तापन की अनुभूति होती अवश्य है । किंतु छोड़ने में कर्तापन की की अनुभूति भला क्यों । छोड़ने में कर्ता नहीं होता। छोड़ने में आदेश नहीं होता। छोड़ने की क्रिया स्वतः ही होती है ।
जब साधक साँसों को छोड़ता है, तब वह देह को उसकी स्वाभाविक बुद्धि पर छोड़ देता है। देह जानती है कि हवा कैसे बाहर जानी है। फेफड़े जानते हैं कि कितना खाली होना है। श्वसन तंत्र को आपकी चतुराई की आवश्यकता नहीं है। आवश्यकता है केवल हस्तक्षेप के अभाव की।
यहीं से प्राणायाम साधना बनता है।
अब इसे दार्शनिक दृष्टि से देखें, तो शब्द “निकालना” अहंकार का विस्तार है, और “छोड़ना” अहंकार का विसर्जन। अकर्तापण का विस्तार । यही निरोगी अवस्था कहलाती है ।
जो व्यक्ति जीवन में हर जगह “करने” में लगा है, वही प्राणायाम में भी करता है। और जो प्राणायाम में भी करता रहता है, वह कभी ध्यान में प्रवेश नहीं कर सकता।
ध्यान का द्वार छोड़ने से खुलता है, न कि निकालने और भरने से।
मानसिक लाभ की बात करें, तो जब साँस छोड़ी जाती है, तब मस्तिष्क को यह संदेश मिलता है कि खतरा समाप्त हो गया है। तंत्रिका तंत्र शांत होता है। विचारों की गति धीमी पड़ती है। मन पहली बार स्वयं को सुरक्षित अनुभव करता है।
आध्यात्मिक लाभ की बात करें, तो छोड़ने के क्षण में साधक पहली बार यह अनुभव करता है कि जीवन चल रहा है—मैं चला नहीं रहा। यही अनुभव आगे चलकर प्रकृति और पुरुष का अनुभव करवा देता है । और यह अनुभव ही तो स्वस्थ होना कहलाता है । स्वस्थ शब्द का मूल अर्थ ही है स्वयं में स्थित हो जाना ।
देह का आरोग्य भी यहीं से प्रारंभ होता है। क्योंकि अधिकांश रोग करने से पैदा हुए हैं— अधिक करने से, ज़ोर लगाने से, सुधारने की जिद से। जब साँस छोड़ी जाती है, तो देह को विश्राम मिलता है। और विश्राम कोई आलस्य नहीं है—विश्राम वह भूमि है जहाँ से स्वास्थ्य, संतुलन और प्राणशक्ति का पुनर्जन्म होता है।
इसलिए प्राणायाम में यह प्रश्न गौण नहीं है कि आप कितनी देर साँस रोकते हैं, कितनी गिनती में लेते हैं या छोड़ते हैं। मूल प्रश्न यह है— आप साँस निकाल रहे हैं, या साँस छोड़ रहे हैं?
यदि यह अंतर स्पष्ट हो गया, तो प्राणायाम अपने आप ध्यान में बदलने लगेगा। मन शांत होगा। चेतना गहरी होगी। और देह—स्वतः निरोगी होने लगेगी। यही प्राणायाम में साँसों के बाहर निकलने का विज्ञान है । यही उसका दर्शन है।
Copyright - by Yogi Anoop Academy