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सुनो और बोलो मत- सुनो पर बुनो मत

1 month ago By Yogi Anoop

सुनो… और बोलो मत। सुनो… पर बुनो मत।

मनुष्य का अधिकांश जीवन सुनने में नहीं, बुनने में बीत जाता है। जैसे ही भीतर कुछ घटित होता है—कोई स्पंदन, कोई अनुभूति, कोई हल्का-सा कंपन—मन तुरंत उसे शब्द दे देता है, अर्थ दे देता है, और फिर उससे एक कथा बुनने लगता है। यही बुनावट मन को सुरक्षित लगती है, क्योंकि कथा में नियंत्रण होता है। पर जहाँ नियंत्रण है, वहाँ बोध नहीं है।

यह लेख जिस सुनने की बात करता है, वह कानों से सुनी जाने वाली ध्वनि नहीं है। यह वह सुनना है जो मस्तिष्क के भीतर उठ रही सूक्ष्म तरंगों और स्पंदनों को बिना छेड़े अनुभव करता है। यह ध्वनि नहीं, बल्कि कंपन की संभावना है। जैसे समुद्र की गहराई में उठता कंपन—जो सतह तक आए या न आए, इससे पहले ही उसका अस्तित्व पूर्ण है।

उपनिषद इस स्थिति को श्रवण नहीं, अन्तःश्रवण कहते हैं। कठोपनिषद स्पष्ट करता है कि सत्य न तो वाणी से पकड़ा जा सकता है और न ही तर्क से। जहाँ से वाणी पैदा होती है वहीं वाणी लौट आती है, वहीं से बोध आरंभ होता है। यही कारण है कि उपनिषद मौन में समाप्त होते हैं—क्योंकि सत्य को कहा नहीं जा सकता, केवल बोध होता है । सत्य मौजूद होता है बस उसका बोध हो जाता है । 

वैज्ञानिक दृष्टि से भी ध्वनि कोई ठोस वस्तु नहीं है। वह केवल कंपन है—वायु में, द्रव में, या तंत्रिका-तंत्र में उत्पन्न होने वाला स्पंदन। न्यूरोसाइंस बताता है कि मस्तिष्क ध्वनि को सीधे नहीं सुनता; वह पहले उसे विद्युत संकेतों में बदलता है, फिर स्मृति, संस्कार और पूर्व अनुभवों के आधार पर उसका अर्थ गढ़ता है। अर्थात् जो हम सुनते हैं, वह वास्तविक ध्वनि नहीं, बल्कि मन द्वारा निर्मित व्याख्या है।

यहीं योगी अनूप का तर्क प्रवेश करता है—

“यदि तुम व्याख्या से पहले रुक सको, रुकने की कला जानते हो तो बोध घटित हो सकता है।”

जैसे ही व्याख्या आती है, बुनावट शुरू हो जाती है। अच्छा-बुरा, सही-गलत, मेरा-तेरा—ये सब बुनावट के धागे हैं। उपनिषद इसे नाम-रूप की रचना कहते हैं। नाम और रूप आते ही अनुभव खंडित हो जाता है। बोध अखंड है; वह किसी वर्गीकरण को स्वीकार नहीं करता।

योगी अनूप के अनुसार, समस्या ध्वनि में नहीं, सुनने वाले में है। मन सुनने नहीं देता, क्योंकि सुनना उसके अस्तित्व के लिए खतरा है। मन का पूरा ढांचा ही बुनावट पर टिका है। इसलिए वह हर अनुभव को तुरंत पकड़कर कहानी बना लेना चाहता है। पर बोध कहानी से नहीं आता। बोध तब आता है जब कहानी बनाने वाला ढीला पड़ जाता है। जब कहानी बंद होती है । 

मांडूक्य उपनिषद जिस अमात्र की बात करता है—जहाँ न ध्वनि है, न शब्द—वह कोई दार्शनिक कल्पना नहीं, बल्कि सीधा अनुभव है। योगी अनूप इसे सरल शब्दों में कहते हैं—

“जहाँ सुनने वाला सुनता हुआ भी कुछ न सुने स्थिर बैठ जाए।”

जब तुम स्थिर होते हो—न कुछ जोड़ते हुए, न कुछ घटाते हुए—तब प्रकृति के मूल चरित्र को स्वयं के द्वारा बोध होने लगता है । यह प्रकृति बाहर की भी है और भीतर की भी। जब बाहर और भीतर के बीच हस्तक्षेप मिटता है, तब बोध अखंड हो जाता है। न साधक बचता है, न साध्य; न श्रोता, न वक्ता।

यही सुनना है— जहाँ कोई कहने वाला नहीं, कोई बुनने वाला नहीं, और कोई कहने योग्य शब्द भी नहीं।

वहीं उपनिषद मौन हो जाते हैं, वहीं विज्ञान अपनी सीमा स्वीकार करता है,

और वहीं—दर्शन घटित होता है। जहाँ दृष्टा दृश्य को स्वयं के लिए साधन बना लेता है । 

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