"विचारों को देखो" — यह आधुनिक ध्यान-प्रशिक्षण में एक लोकप्रिय परामर्श है। किंतु मेरे अनुभव में यह संभव नहीं है, अथवा कम से कम उतना सीधा नहीं जितना सामान्य रूप से सुझाया जाता है। इस असंभवता का कारण सरल किंतु गहरा है: विचार करना एक ऐक्षिक प्रक्रिया है, न कि अनैक्षिक। विचार किया जाता है; विचार स्वतः, अपने आप तो घटित नहीं होता है। यह अंतर — क्रिया करने वाले और क्रिया के बीच का संबंध — ही सारे भ्रम का मूल है।
बाहरी जगत में इस अंतर को समझना सहज है। जब बारिश हो रही हो, तुम बारिश को घटित होते हुए देख सकते हो। वर्षा की बूँदें गिरती हैं, बादल तैरते हैं, हवा चलती है — ये सब कुछ तुम्हारे बाहर घट रहा है। तुम इन घटनाओं के दृष्टा हो सकते हो क्योंकि वहाँ कर्ता और क्रिया तुमसे अलग हैं। तुमने न तो बारिश को आमंत्रण दिया, न ही उसमें सक्रिय भूमिका निभा रहे हो। इसी स्थिति में — जहाँ तुम अकर्ता रहते हो — तुम्हारी साक्षी चेतना मुक्त रहती है, निरपेक्ष रहती है। घटना तो घटती है, किंतु तुम उससे अपनी एकता नहीं बनाते। सांख्य दर्शन इसी स्थिति को पुरुष का स्वभाव कहता है — सदा द्रष्टा, कभी क्रिया में भागीदार नहीं।
यहाँ ही एक सूक्ष्म सत्य उभरता है। यदि तुम किसी घटना को विचार के माध्यम से अपने से जोड़ लेते हो — यदि तुम घटना को व्यक्तिगत मानने लगते हो, उससे एकीकृत हो जाते हो — तो उसी पल तुम अकर्ता नहीं रह जाते। विचार की प्रक्रिया का यही कार्य है: बाहरी घटना को आंतरिक मन से जोड़ना, उसे अर्थ देना, उसमें अपनी भागीदारी अनुभव करना। जब कोई विचार चलता है, तो वह सदा किसी अनुभव को मन में लाकर जोड़ता है। इस जुड़ाव के पल में, विचार करने वाला (यानी "मैं") और विचार की प्रक्रिया अभिन्न हो जाती है।
अब यहाँ वह बड़ी समस्या आती है जिसे अक्सर नजरअंदाज किया जाता है: जब "मैं" स्वयं मन के माध्यम से विचार कर रहा होता है, तो उस पल "मैं" उन विचारों को कैसे देख सकता है? जब कर्ता स्वयं क्रिया में संलग्न हो, तो कौन देखेगा? जब कर्ता स्वयं दृश्य में उलझ जाता है, तो दृष्टा कहाँ रह जाता है?
एक सरल उदाहरण लेते हैं। जब तुम गहन रूप से किसी समस्या पर विचार करते हो — मान लो कोई महत्वपूर्ण निर्णय लेना है — तब तुम्हारा मन पूरी तरह उस विचार प्रक्रिया में तल्लीन होता है। विचार चलते हैं, एक दूसरे को जन्म देते हैं, मन उन्हें आकार देता है। क्या उसी पल तुम अपने विचारों के दर्शक रह सकते हो? प्रायोगिक रूप से नहीं। क्योंकि "देखना" एक निष्क्रिय अवस्था माँगता है, जबकि "विचार करना" सर्वथा सक्रिय है। जब कोई समस्या को हल करने के लिए विचार करता है, तो मन स्वयं समस्या बन जाता है, विचारक समस्या में समा जाता है। उस पल साक्षीत्व का अनुभव एक पलायन-कल्पना है, वास्तविकता नहीं।
भोजन का उदाहरण और भी स्पष्ट है। जब तुम भोजन करते हो और मन पूरी तरह भोजन के स्वाद पर केंद्रित हो — जब रसना की संवेदना और मन की उस संवेदना के प्रति गहरी सचेतता हो — तो क्या उस पल तुम स्वाद को "देख" सकते हो? क्या तुम स्वाद से पृथक रह सकते हो? मेरे अनुभव में, यह असंभव है। क्योंकि स्वाद लेना और स्वाद के साथ मन का एकीकरण एक ही प्रक्रिया है। जब तक तुम सच में भोजन का आनंद ले रहे हो, तब तक तुम "अकर्ता" नहीं हो सकते, तुम उसी क्रिया में पूरी तरह शामिल हो। स्वाद की यह गहन गति विचार के माध्यम से ही संभव होती है — जब मन उस क्षण में पूरी तरह भोजन का "अर्थ" लगाता है, उसे अपना बनाता है।
सांख्य दर्शन में इसे द्रष्टा-दृश्य विवेक कहा जाता है। पुरुष (चेतना) और प्रकृति (प्रकृति-माध्यमी मन और संवेदना) का भेद ही मुक्ति का मूल है। किंतु यह भेद तभी संभव है जब पुरुष (आत्मा) सच में अलग रहे, जब द्रष्टा सच में दृश्य से पृथक रहे। मनोविज्ञान की भाषा में, यह एक तरह की "अवलोकन-दूरी" (observational distance) है। किंतु जब विचार चलता है — जब "मैं" अपने ही विचार में लिप्त हो जाता है — तो यह दूरी मिट जाती है। न्यूरोसाइंस से जानते हैं कि जब मन किसी कार्य में पूरी तरह व्यस्त होता है, तो डिफॉल्ट मोड नेटवर्क (जो आत्म-संदर्भ चिंतन के लिए जिम्मेदार है) शांत हो जाता है। उस पल "साक्षी भाव" का अनुभव करना तंत्रिका-जैविकीय रूप से संभव नहीं होता।
यह बिल्कुल सच है कि बाहरी घटनाओं को (जैसे पक्षियों को उड़ते देखना, किसी व्यक्ति को बात करते देखना) तुम साक्षी रहकर देख सकते हो, क्योंकि वहाँ तुम्हारा व्यक्तिगत निवेश नहीं है, अथवा कम से कम आवश्यक नहीं है। किंतु विचार अलग है। विचार सदा व्यक्तिगत होता है, सदा "मेरा" होता है। "मेरे" विचार को मैं कैसे निष्पक्ष दृष्टि से देख सकता हूँ? यह एक द्वंद्व है जिसे योगियों ने गहराई से समझा है। संत और साधकों का अनुभव यह रहा है कि जब विचार अत्यंत सूक्ष्म और शांत हो जाते हैं, तब ही कहीं साक्षी-भाव संभव होता है। चलते हुए विचारों के साक्षी होना संभव नहीं है ।
इसलिए सत्य यह है कि सक्रिय विचार करते समय विचारों के साक्षी नहीं हुआ जा सकता। जो कुछ संभव है वह यह है: विचार की प्रक्रिया को पहचानना, उसकी गति को समझना, उसके आरंभ और अंत को देखना। किंतु यह "देखना" तब तक संभव है जब तक विचार पूर्ण रूप से सक्रिय न हो। जैसे ही विचार पूरी ताकत से चलने लगे, देखने वाला वह विचार में ही बह जाता है। तो वह करता बन चुका हुआ होता है । तब उस समय साक्षी होना असंभव है । जैस ही ही उसको स्वयं के अलगाव की अनुभूति होती है वैसे ही विचार चलने बंद हो जाते हैं । तो यह सिद्ध है कि विचारों का साक्षी नहीं बल्कि विचारों के आभाव का साक्षी होना संभव है ।
योगी अनूप
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