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सोच से अनुभव की ओर जाना

4 weeks ago By Yogi Anoop

सोच से अनुभव की ओर जाना — ध्यान का वास्तविक संक्रमण

कई तथाकथित गुरु ध्यान को इस प्रकार परिभाषित करते हुए कहते हैं कि ध्यान का अर्थ है—सोच से परे जाकर अनुभव करना। वे समझाते हैं कि ईश्वर को हमने देखा नहीं है, इसलिए उसके बारे में सोचना चाहिए; यह कल्पना करनी चाहिए कि वह हृदय में है, प्रकाशस्वरूप है, भीतर विराजमान है। उनका कहना होता है कि इस प्रकार के विचार करते-करते साधक धीरे-धीरे सोच से आगे बढ़कर अनुभव की अवस्था में चला जाता है और यही ध्यान है।

मैं यहाँ किसी प्रकार की नकारात्मक टिप्पणी नहीं कर रहा, केवल इतना कहना चाहता हूँ कि मेरे अनुभव में यह अनुभवात्मक ध्यान नहीं है—यह केवल विचार की एक परिष्कृत अवस्था है। सोच से सोच के परे जाने का विचार मात्र है जो कि संभव नहीं है । 

मेरा अनुभव के अनुसार ; ध्यान के लिए यदि सोचना पड़ रहा है, तो ध्यान घट ही नहीं रहा—वहाँ केवल सोच-विचार चल रहा है। ध्यान का मूल स्वभाव यह नहीं है कि आप किसी विचार को पकड़ें, चाहे वह कितना ही पवित्र, सूक्ष्म या दिव्य क्यों न हो। विचार ईश्वर का हो या संसार का—वह विचार ही रहता है।

स्वस्थ होने के लिए, स्वयं में स्थिर और स्थित होने के लिए, सोचना नहीं पड़ता; बल्कि उस सत्ता को अनुभव करना पड़ता है जो सोच रही है। और वह सोचने वाला कोई दूसरा नहीं—वह स्वयं आप ही हैं।

जब दृष्टि सोच पर नहीं, बल्कि सोचने वाले पर टिकती है, तब सोच उसी पल स्वतः ही समाप्त हो जाती है । यहाँ सोच को रोकने का प्रयास नहीं होता, न ही उसे दबाने की कोई तकनीक अपनाई जाती है। जो सोच रहा होता है उसी को अनुभव करना पड़ता है । 

मैं स्वयं को अनुभव करने के लिए किसी और का चित्र बनाता हूँ हूँ और यह सोचता हूँ कि वहाँ से ऊर्जा आ रही है । यह सब इसलिए कि सोच से ऊपर चले जाएँ । किंतु मैं स्वयं को अनुभव करने के लिए स्वयं को अनुभव भला क्यों नहीं कर सकता । “मैं” तो सदा विद्यमान रहता ही है । “मैं” स्वयं “मैं” को अनुभव क्यों नहीं करता , उसे किसी कल्पना को करके उसे अनुभव करना क्यों पड़ता अहि । जब वह किसी काल्पनिक वस्तु को अनुभव कर सकता जो कि उसके द्वारा ही बनायी गई रही तो इसका अर्थ है कि उसमें अनुभव करने की सामर्थ्य है , वह स्वयं का भी अनुभव कर सकता है । 

सर्वोत्तम तरीका यही है कि वह प्रत्यक्ष रूप से स्वयं का ही अनुभव करे । यही पूर्ण ज्ञानात्मक तरीका है । 

सत्य तो यह है कि वह स्व अनुभव चाहता है । जैसे ही उसे अनुभव प्राप्त होने लगता है वैसे ही मन पर नियंत्रण , सोच पर नियंत्रण जैसे शब्द अर्थहीन हो जाते हैं । यहाँ तक कि एकाग्रता शब्द भी अर्थहीन सा हो जाता है । एकाग्रता का तो अर्थ है कि द्वैत का होना । आप कुछ हो और जिस वस्तु पर एकाग्र हो वह कुछ और है । किंतु जब आप स्वयं का ही अनुभव करने लगते हो तब एकाग्रता का भला क्या महत्वपूर्ण । स्वयं का स्वयं में स्थिर जो जाना । यही तो सर्वोत्तम अवस्था है इस मनुष्य की । 

इसीलिए ध्यान को मैं स्वयं में स्थित होने का सर्वोत्तम साधन ही मानता हूँ । यह सोच से परे है क्यों कि यह सोच के माध्यम से प्राप्त की ही नहीं जा सकती है । 

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