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रोग तब बढ़ता है जब मन अपरिपक्व होता है

4 weeks ago By Yogi Anoop

रोग तब बढ़ता है मन अपरिपक्व होता है । शरीर की परिपक्वता मन की परिपक्वता में अंतर । 

एक और बहुत महत्वपूर्ण बात है, जिसे दार्शनिक रूप से समझना बहुत आवश्यक है कि शरीर की उम्र तो धीरे-धीरे बढ़ रही है, लेकिन मन की उम्र नहीं बढ़ रही होती ।

यदि बचपन को देखें, तो बच्चा अपनी कल्पनात्मकता से ही बहुत खुश हो जाता है। वह अपनी कल्पना में ही 80–90% आनंद ले लेता है। खाना-पीना तो बाद की बात है। वह सोचता है कि बड़ा होकर यह करेगा, वह करेगा—फरारी लेगा, जहाज उड़ाएगा—और उसी सोच से खुश हो जाता है। उस छोटे से पल की कल्पना से वह खुश हो जाता है । 

लेकिन समस्या यह है कि शरीर की उम्र बढ़ती जाती है, पर मन उसी काल्पनिक मनोसंसार में अटका रहता है। बल्कि कई बार मन और भी ज्यादा फैंटेसी में चला जाता है। वह स्वयं को भक्ति के मार्ग में ले जाता हुआ दिखता है । उसे लगता है कि कुछ अज्ञात शक्तियाँ उसके लिए सब कुछ कर देंगी । अर्थात् उसी काल्पनिक संसार में घुसता चला जाता है । 

यहीं से असंतुलन का प्रादुर्भाव होना शुरू होता है—
शरीर की उम्र तो बढ़ गई , यहाँ तक कि वह जीवन चक्र को पूरा करने की तरफ़ बढ़ रहा होता है किंतु बिल्कुल इसके विपरीत मन की उम्र बढ़ने के बजाय घट रही होती है । अर्थात् मन अभी भी अपरिपक्व है । उसका तालमेल देह की उम्र के साथ नहीं है । 

शरीर की उम्र बढ़ने पर उसे इंस्टेंट फूड या इंस्टेंट एनर्जी की जरूरत नहीं पड़नी चाहिए, जब कि पचपन में उसे उसी भोजन की तलाश होती है जिसमें तुरंत ऊर्जा देने की सामर्थ्य हो । जैसे बचपन में गुड़, शक्कर, मीठा—की ओर , जंक फ़ूड खाने की बहुत इक्षा होती है । मैं बचपन में दूध, चावल, गुड़ या शक्कर मिलाकर खाते थे—क्योंकि शरीर को तुरंत ऊर्जा चाहिए थी। 

लेकिन अब शरीर परिपक्व हो चुका है, जबकि मन अभी भी इंस्टेंट सुख और इंस्टेंट ऊर्जा की मांग कर रहा है। वह बार-बार उसी प्रकार के भोजन और अनुभवों की ओर भागता है। जबकि होना यह चाहिए कि मन, शरीर की परिपक्वता के अनुसार निर्णय ले।

यदि देह के आधार पर मन परिपक्कव हो रहा अहि तब उसी भोजन की प्राथमिकता देगा जो देह के लिए सर्वोत्तम होगा । यह एक प्रकार की स्वाभाविक प्रक्रिया है । इसीलिए भारतीय सभ्यता में गुरु ही नहीं बल्कि एक सामान्य से सामान्य व्यक्ति का भोग 24 घंटे में सिर्फ 1 बार ही होने का नियम था । मेरी माँ जिनकी उम्र 84 वर्ष है अभी भी शाम के भोजन को ज्यादातर नहीं लेती हैं । यदि उनके शुगर के लेवल को देखें तो मेरे स्वयं के शुगर के लेवल से अच्छा है । अभी भी कुंभ मिले में जितने भी लोग एक महीने के लिए तपस्या करें के लिए रहते हैं वे २४ घंटे में सिर्फ बार ही भोजन करते हैं । 

इसके पीछे का विज्ञान समझे कि यह शरीर की शुद्धता और स्वास्थ्य के लिए तो था है किंतु मन को और शुद्ध करने के लिए था । क्योंकि मन मस्तिष्क का पूरा जोड़ सिर्फ भोजन को पचाने पर ही केंद्रित होगा तो रोग का आना तो स्वाभाविक ही है । और उस अवस्था में मन की परिपक्वता में वृद्धि भला कैसे होगी ।  

मन की उम्र बढ़ने का अर्थ है—उसका धैर्य बढ़ना। उसके समझने में कई पक्ष का जागृत हो जाना । जब मन किसी भी विषय को बहुत संकुचित दृष्टि से ख़ता है तब उसकी उम्र कम होती है किंतु जब उसकी दृष्टि में व्यापकता आती है तब उसके अंदर प्रतिक्रिया कम होने लग जाती है । इसी को मैं कहता हूँ मन की उम्र का बढ़ जाना 

ध्यान दें—मन की परिपक्वता के बढ़ने का एक संकेत यह भी है कि वह “स्वाद” को गहराई से लेने की मन में क्षमता बढ़ जाती है  । जैसे पुराने समय में लोग भोजन करते समय आंख बंद कर लेते थे—पूरा ध्यान स्वाद पर होता था। उस क्षण में आंख, कान—सब ढीले पड़ जाते हैं, क्योंकि पूरा फोकस अनुभव पर होता है।  यह एक गहराई का संकेत है—जहां मन अनुभव की गहराई में पूरी तरह उतर जाता है।

इसके विपरीत, बच्चे जल्दी-जल्दी खाते हैं, शोर करते हैं, और अपने ही बनाए शोर में दूसरे को सुन नहीं पाते। यही बात मन पर भी लागू होती है—यदि मन के भीतर बहुत शोर है, बहुत ओवरथिंकिंग है, तो वह न दूसरों को सुन पाएगा, न स्वयं को।

इसलिए जैसे-जैसे शरीर की परिपक्वता बढ़ रही होती है उसी के अनुरूप मन की भी परिपक्वता बढ़ना  आवश्यक होता है ।

इसीलिए बार-बार कहा जाता है—मन का रूपांतरण करो, परिपक्व करो।
यदि मन परिपक्वता की ओर नहीं बढ़ेगा वह रोग की तरफ़ ले जाएगा । शरीर को तो ले ही जाएगा वह स्वयं मन को भी रोगी बना देगा । इससे मतलब नहीं उसका मन पूजा-पाठी स्वभाव का है अथवा अधार्मिक  । 

यही कारण है कि साधना में मन को उम्र के अनुसार प्रशिक्षित किया जाता है। जैसे-जैसे शरीर बदलता है, वैसे-वैसे मन भी कर्मेंद्रियों और ज्ञानेंद्रियों की आवश्यकताओं को समझकर उनके अनुसार व्यवहार करता है।

बचपन में मन और आंखों में ज्यादा सक्रियता व क्रिया कलाप होता है । —ऐसे खेल कूद पसंद होते हैं जिसमें प्रतियोगिता होती है । जिसमें किसी दूसरे को दिखाना प्रशांत होता है । स्वयं को दूसरों के सामने सिद्ध करना अच्छा लगता है । किंतु जैसे-जैसे उम्र बढ़ती है, मन और देह परिपक्वता की ओर बढ़ता है तब उसे किसी से प्रतियोगिता नहीं बल्कि स्वयं के लिए सब कुछ करना पसंद होता है । जैसे ऐसे लोग गोल्फ खेल पसंद होगा । क्योंकि उसमें उनकी प्रतियोगता स्वयं से ही होती है किसी अन्य से नहीं । 

इस प्रकार के मन की एकाग्रता में तनाव सम्भव नहीं है , वह चाहे जितने समय तक एकाग्रता बढ़ाये बढ़ा सकता है क्योंकि उसे दूसरों के सामने स्वयं को सिद्ध करना ही नहीं है उसे तो स्वयं के लिए ही जीना है । इसी में मन की गहराई बहुत तीव्रता से बढ़ती है । 

इसीलिए मैं मन को “युवा” बनाने का अर्थ यह नहीं कहता हूँ  कि उसे बचकाना बनाए रखें, बल्कि इसका अर्थ है—उसकी ऑब्जर्वेशन और समझ को बढ़ाना। वह निरंतर वृद्धि कर रहा है । यहाँ तक कि देह की परिपक्वता रुक गई किंतु मन की परिपक्वता की कोई उम्र नहीं है । उसे कितना भी बढ़ा सकते हैं । 

और अंत में एक बहुत महत्वपूर्ण बात—बीमारियां केवल गलत भोजन से नहीं आती वह मन की अपरिपक्वता  से अधिक आती है । क्योंकि अपरिपक्व मन ग़लत भोजन करने के लिए हमेशा प्रेरणा देता रहता है । 


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