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रोग का मूल: शरीर नहीं, मन की स्थिति

1 week ago By Yogi Anoop

 रोग का मूल — शरीर नहीं, मन की स्थिति 

जब हम रोग को समझने का प्रयास करते हैं, तो सामान्यतः हमारी दृष्टि शरीर पर टिक जाती है—हम भोजन को देखते हैं, जीवनशैली को देखते हैं, और इन्हीं को कारण मान लेते हैं। यह दृष्टि पूरी तरह गलत नहीं है, परंतु अधूरी अवश्य है। क्योंकि यह केवल परिणामों को देखती है, कारणों की जड़ तक नहीं पहुँचती।

यदि इस प्रश्न को थोड़ा और गहराई से देखा जाए, तो स्पष्ट होता है कि भोजन स्वयं में कारण नहीं है, बल्कि वह मन की एक अवस्था का प्रकट रूप है। मन जैसा होता है, चयन वैसा ही होता है। इसलिए गलत भोजन का चयन भी एक स्वतंत्र घटना नहीं, बल्कि मन की अस्थिरता का परिणाम है।

दार्शनिक दृष्टि से देखें तो मन का स्वभाव ही अनुभव की ओर जाना है। चाहे वह वाह्य जगत का अनुभव हो , देह व इन्द्रियों का अनुभव हो अथवा दृश्य के माध्यम से दृष्टा का अनुभव हो । ध्यान दें जब मन परिपक्व नहीं होता, तब वह अनुभव में ज़्यादा समय तक ठहर नहीं पाता है । वह हर वस्तु को केवल छूकर आगे बढ़ जाता है—यहाँ तक कि भोजन भी जीभ पर बस छू कर अंदर हो लेता है । न उसमें गहराई होती है, न पूर्णता। न मन संतुष्ट होता है और न ही देह ।  यह अधूरापन ही भीतर एक निरंतर असंतोष को जन्म देता है। और यह असंतोष ही मन को बार-बार बाहरी साधनों की ओर धकेलता है—विशेष रूप से भोजन की ओर, क्योंकि भोजन सबसे सहज और त्वरित संतोष का साधन है। उसे लगता है कि यही ऊर्जा का प्रमुख स्रोत भी है । जो कि है भी किंतु इस पंचकोस देह में ऊर्जा का वितरण पांचों तत्व के माध्यम से ही होता है । न कि सिर्फ़ पृथ्वी तत्व (भोजन) । यद्यपि भोजन में आकाश, वायु, जल, अग्नि इत्यादि सभी तत्व आंशिक रूप से मौजूद हैं किंतु ये भोजन पृथ्वी प्रधान होने के कारण अन्य तत्व देह के लिए प्रभावशील नहीं होते हैं । 

इसीलिए आध्यात्मिक दृष्टि से सूक्ष्म अध्यन करना आवश्यक होता है । जैसे आकाश मन और देह का सबसे वृहद भोजन है जो न केवल देह की बल्कि मस्तिष्क के सूक्ष्म तंत्रों को भी हील कर रहा होता है । और यह तभी संभव है जब मन में परिपक्वता आ जाए । उसके अपरिपक्वता से ही तो रोग का आगमन होता है । आध्यात्मिक दृष्टि से ही मन और देह को आकाश जैसे सार्वभौमिक भोजन से संतुष्ट करते अहीन जिससे रोगों का जन्म ही नहीं होने पाता है ।  

आयुर्वेद भी इस सत्य को अपने ढंग से व्यक्त करता है। आयुर्वेद में “प्रज्ञापराध” को रोगों का मूल कारण कहा गया है—अर्थात् बुद्धि की भूल, जागरूकता की कमी। जब व्यक्ति अपनी प्रकृति, अपनी सीमा और अपने वास्तविक हित को जानते हुए भी उसके विपरीत आचरण करता है, तो वही प्रज्ञापराध है। यह केवल ज्ञान की कमी नहीं, बल्कि उस ज्ञान को जीने में असमर्थता है—जो कि मन की अपरिपक्वता से ही उत्पन्न होती है। इसलिए 

अपरिपक्व मन का एक महत्वपूर्ण लक्षण है—अनुभव में एकाग्रता की कमी। ऐसा मन किसी भी इंद्रिय अनुभव पर पर्याप्त समय तक ठहर नहीं पाता। वह स्वाद को भी पूरी तरह नहीं जी पाता, श्वास को भी नहीं, स्पर्श को भी नहीं। इसलिए हर अनुभव अधूरा रह जाता है, और अधूरा अनुभव संतोष नहीं देता। यही असंतोष मन को बार-बार नए अनुभवों की खोज में ले जाता है—और इस खोज में वह बार-बार गलत विकल्प चुनता है।

इस प्रकार, गलत भोजन केवल एक लक्षण बन जाता है, जबकि वास्तविक रोग मन की दिशा में छिपा होता है। यदि केवल भोजन को सुधारने का प्रयास किया जाए, तो वह परिवर्तन क्षणिक रहेगा, क्योंकि मन की वही पुरानी प्रवृत्ति फिर से व्यक्ति को उसी चक्र में ले आएगी।

अतः मूल प्रश्न यह नहीं है कि “आप क्या खा रहे हैं?”, बल्कि यह है कि “आप किस मनःस्थिति से खा रहे हैं?”
 जब मन अनुभव में ठहरना सीखता है, जब इंद्रियाँ भटकने के बजाय साक्षीभाव में टिकने लगती हैं, तब चयन अपने-आप बदल जाता है। उस अवस्था में स्वास्थ्य कोई लक्ष्य नहीं रहता, बल्कि एक स्वाभाविक परिणाम बन जाता है—मानो शरीर केवल मन की संतुलित दिशा का प्रतिबिंब हो।


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