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पेट से गैस कैसे निकले: उदर प्राणायाम

1 week ago By Yogi Anoop

पेट से गैस कैसे निकले: उदर प्राणायाम 

मैं बार-बार कहता हूँ कि पेट से वायु तब तक नहीं निकल सकती, जब तक पेट की मांसपेशियाँ ढीली नहीं होंगी। और पेट की मांसपेशियाँ तब तक ढीली नहीं होंगी, जब तक मन उन्हें ढीला नहीं छोड़ेगा। मन भी तब तक पेट को ढीला नहीं छोड़ता, जब तक उसे यह बोध नहीं हो जाता कि उसने ही पेट को जकड़ कर रखा है।

इस सत्य को समझने में महीनों, कभी-कभी वर्षों का समय लग जाता है कि व्यक्ति स्वयं ही अपने पेट और अंगों को भीतर से खींचकर पकड़े हुए है। यह पकड़ इतनी सूक्ष्म होती है कि व्यक्ति उसे सामान्य अवस्था मान बैठता है, जबकि वास्तव में वही जकड़न उसकी अनेक समस्याओं का मूल बन जाती है।

जब पेट में यह आंतरिक खिंचाव बना रहता है, तो केवल वायु ही नहीं रुकती, बल्कि पाचन की पूरी प्रक्रिया प्रभावित होने लगती है। डायफ्राम की गति सीमित हो जाती है, आंतों की स्वाभाविक लय (पेरिस्टालिसिस) धीमी पड़ जाती है, और शरीर के भीतर एक प्रकार का दबाव बना रहता है। यह दबाव केवल भौतिक नहीं, बल्कि मानसिक भी होता है — जैसे भीतर कुछ लगातार पकड़ा हुआ हो। ऐसा लगता है कि साँसों की सामान्य अवस्था में कोई बाधा है । माथा और सिर जकड़ा जकड़ा प्रतीत हुआ लगता है । 

वस्तुतः इस जकड़न को समझे बिना कोई भी बाहरी उपाय स्थायी समाधान नहीं दे सकता। क्योंकि समस्या मांसपेशियों की नहीं, उस सूक्ष्म मानसिक प्रवृत्ति की है जो लगातार पकड़ बनाए रखती है। इसलिए समाधान भी वहीं से प्रारंभ होता है — बोध से। वह बोध कि आपने स्वयं शरीर के प्रमुख हिस्सों को जकड़ कर पकड़ रखा है। 

जब इस सूक्ष्म बोध के द्वारा यह प्रतीत होता है कि उसके मन के द्वारा ही पेट के हिस्से को पकड़ रखा है तो वह उसे ढीला व छोड़ने का प्रयत्न कर सकता है । 

उसे यह बोध होना कि “मैं ही इस पेट को पकड़े हुए हूँ”,यह एक बहुत बड़ी साधना है । क्योंकि इसका बोध होना कि ‘मैं’ ने पकड़ रखा है बहुत मुश्किल से आता है । इस बोध के बाद ही छोड़ने की प्रक्रिया का उपाय निकला जा सकता है । 

इसके लिए एक सरल उपाय है प्राणायाम जो बहुत आसानी से मन द्वारा उस पकड़ को ढीला कर सकता है । 

श्वास के माध्यम से आंतरिक शिथिलता

प्राणायाम की विधियों सामानतयः बैठकर ही अभ्यास की सलाह दी जाती है किंतु मैंने अपने प्रयोगों के माध्यम से प्राणायाम को लेटकर करने पर प्रयोग किया है जिससे “मैं” को बहुत सरलता के साथ पेट के खिचाव को अनुभव कर सकता है । इसके लिए पेट से संबंधित साँस को दो चरण में बाँटा गया है । 

प्रक्रिया का पहला चरण है — सीधा पीठ के बल लेट कर श्वास लेना। धीरे-धीरे और गहराई से अनुभव करते हुए पेट को सामान्य रूप से फुलायें । कुछ ऐसा ही जैसे हवा को भरते हुए गुब्बारा फूलता है । 

श्वास नाक से भीतर लेते हैं, तो ध्यान पेट पर रखें। श्वास के साथ पेट को बाहर की ओर उठने दें। यह प्रयास न करें कि पेट को नियंत्रित करें, बल्कि उसे स्वाभाविक रूप से फैलने दें। अनुभव करें कि पेट चारों दिशाओं में फैल रहा है — ऊपर, नीचे, दाएँ और बाएँ।  

दूसरा चरण है — श्वास छोड़ना। अब धीरे-धीरे श्वास को बाहर छोड़ें। छोड़ने का मूल अर्थ ही है कि मन का साँसों के निकालने पर कोई प्रयत्न नहीं है । बस स्वतः ही बाहर जा रही है । अब साँसों को बाहर जाते समय पेट की शिथिलता का अनुभव करना है । चूँकि साँसों के बाहर जाने पर कोई नियंत्रण ही नहीं है तो पेट की मांसपेशियों में शिथिलता होने लगेगी । उसी ढीलेपन को अनुभव करना है । उस ढीलेपन में विश्राम का अनुभव करना होता है । 

इस पूरी प्रक्रिया को लगभग 11 मिनट तक निरंतर दोहराएँ। हर श्वास के साथ थोड़ा-थोड़ा ढीलापन आएगा, और हर श्वास छोड़ने के साथ जकड़न और कम होती जाएगी। धीरे-धीरे शरीर और मन दोनों एक साथ शिथिल होने लगते हैं।

नियमित अभ्यास से पेट की जकड़न बहुत कम समय में ही घटने लगती है । पाचन क्रिया में सुधार आना प्रारम्भ  होने लगता है और जो गैस भीतर फँसी रहती है, वह स्वाभाविक रूप से बाहर निकलने लगती है। यह केवल एक शारीरिक अभ्यास नहीं है, बल्कि भीतर की पकड़ को पहचानकर उसे धीरे-धीरे छोड़ने की एक प्रक्रिया है।

ध्यान दें यह केवल एक श्वास तकनीक नहीं, बल्कि अपने ही भीतर बनी उस अदृश्य पकड़ को पहचानने और उसे धीरे-धीरे छोड़ देने की प्रक्रिया है — जहाँ उपचार किसी बाहरी हस्तक्षेप से नहीं, बल्कि भीतर के बोध और विश्राम से होता है।

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