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पेट में भारीपन या जकड़न

6 days ago By Yogi Anoop

क्या वायु के दबाव से पेट में भारीपन या जकड़न महसूस होती है ! 

 मैं उर्ध्वगामी वायु को हमेशा उदान वायु कहता हूँ। उर्ध्वगामी वायु का तात्पर्य ऐसी वायु से है जो प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से आमाशय में बनती है। भोजन में गति उत्पन्न करने के लिए इस वायु का आमाशय में अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान होता है। वायु का कार्य ही है किसी भी पृथ्वी या ठोस तत्व में गति देना। अर्थात् जब भोजन आमाशय में आता है, तो उसे छोटी आंतों तक ले जाने में यह सहायता करती है। भोजन के आगे बढ़ जाने के पश्चात यह वायु शांत हो जानी चाहिए।

जब यह वायु आमाशय से भोजन के छोटी आंत में जाने के बाद भी शांत नहीं होती, बल्कि निरंतर बनती रहती है, तब इसे मैं उदान वायु की विकृति कहता हूँ। सामान्यतः खाली पेट में वायु का निर्माण नहीं होना चाहिए, क्योंकि पेट में कोई ठोस तत्व उपस्थित नहीं होता। वायु का मूल स्वभाव है कि वह अपने अस्तित्व को प्रकट करने के लिए कुछ न कुछ साथ लेकर चले। जैसे नीचे से निकलने वाली वायु भी कुछ सूक्ष्म कणों के साथ गंध लेकर निकलती है। कुछ लोग यहाँ पर यह सोच सकते हैं कि उनकी नीचे निकलने वाली वायु में तो गंध नहीं आती है,  तो उन्हें इस भुलावे में नहीं रहना चाहिए । आंतों से किसी भी प्रकार की वायु के निकलने का तात्पर्य ही है कि उसमें कहीं ना कहीं गंध है । भले ही प्रत्यक्ष रूप से उसमें बदबू महशूष नहीं हो रही हो । 

ध्यान दें इसी आधार पर, जब यह उर्ध्वगामी वायु खाली पेट में भी बन रही होती है, तो इसका तात्पर्य है कि मन-मस्तिष्क से ऐसा कोई संकेत आ रहा है कि पेट में कुछ उपस्थित है। तभी खाली पेट में भी वायु का निर्माण हो रहा है। रिक्त पेट में इसी वायु का आवश्यकता से अधिक निर्माण पार्ट में संकुचन , जकड़न और साथ साथ पूरे डायाफ़्राम में भी जकड़न पैदा कर देता है । यहाँ तक पेट और डायग्राम में जकड़न ही नहीं बल्कि पूरे सिर में भी जकड़न महशूष होता है । यद्यपि इस जकड़न के जाल से निकलना संभव नहीं होता है । 

अब थोड़ा और गहराई में चलते हैं आख़िर मन में ऐसा क्या घटित हो रहा है, जो रिक्त आमाशय में भी वायु का निर्माण कर रहा है।

मेरे अनुभव में, मन द्वारा इंद्रियों के माध्यम से जो कुछ भी निरंतर संकुचन उत्पन्न किया जा रहा है , जिसमें  कहीं न कहीं पेट के क्षेत्र में अत्यधिक खिंचाव बना हुआ होता है। बात नकारात्मक और सकारात्मक सोच का नहीं है , बात किसी भी सोच के तरीके का है । यदि किसी भी सोच से संकुचन पैदा हो रहा है तो वह समस्या पैदा ही करेगा ।  यही खिंचाव उस उर्ध्वगामी वायु को भ्रमित कर देता है। उसे ऐसा प्रतीत होता है कि वहाँ कोई ठोस तत्व उपस्थित है, और इसी भ्रम के आधार पर वायु का निर्माण होने लगता है। इसी को हम खाली पेट डकार आना कहते हैं। वायु की उल्टी कहते हैं ।  

चूँकि मन-मस्तिष्क कहीं न कहीं पेट को सिकोड़ने की आदत बना चुका होता है। तभी तो भोजन के अभाव में भी वहाँ क्रियाएँ चलती रहती हैं, अर्थात् वायु का निर्माण होता रहता है।

यदि इस आधार पर देखा जाए, तो इस गंधहीन डकार का समाधान किसी भी बाह्य चिकित्सा से संभव नहीं हो सकता है। क्योंकि मन के द्वारा अज्ञानतावश बनायी गई आदत है ।  कारण यह है कि दवाइयाँ केवल उस खिंचाव को कुछ समय के लिए सुन्न कर सकती हैं, किंतु खिंचाव की मूल क्रिया निरंतर चलती रहती है। यदि मन-मस्तिष्क ही इस खिंचाव में व्यस्त है और स्वयं अपनी जड़ों को ही खोद रहा है, तो बाहरी उपचार का क्या अर्थ रह जाता है?

यदि पेट को स्वयं ही जकड़ कर रखा गया है, तो उसका समाधान कौन कर सकता है? यही कारण है कि भोजन करने के बाद पेट और अधिक भारी तथा जकड़ा हुआ प्रतीत होता है। क्योंकि पेट पहले से ही तनाव में था, और भोजन के पश्चात यह भारीपन देह के निचले हिस्से में न जाकर छाती और सिर तक अनुभव होने लगता है।

इसी उर्ध्वगामी वायु को समझना आवश्यक है। इसलिए मैं हमेशा कहता हूँ कि जो समस्या अज्ञानतावश और अबोधता में उत्पन्न हुई है, उसका समाधान केवल दवाइयों, हर्ब्स या भोजन में सुधार से संभव नहीं है। कारण यह है कि पेट में जो निरंतर तनाव बना हुआ है, उसका स्वयं को भी ज्ञान नहीं है। उस तनाव को समाप्त करने के लिए कोई न कोई उपाय खोजना होगा । 

यह उपाय सिर्फ बोध में ही छिपा है अर्थात् योग की कुछ ऐसी विधियां विकसित की गई हैं योगियों और ऋषियों के द्वारा जो इस समस्या के निराकरण के लिए सर्वोत्तम है । 


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