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पूर्व जन्म के कष्ट से मुक्ति

1 month ago By Yogi Anoop

पूर्व जन्म के कष्ट को देखने पर रोग समाप्त हो जाते हैं । 

कष्ट से मुक्ति पास्ट में नहीं, वर्तमान की साधना में है

यह एक आम धारणा है कि, हम अपने भूतकाल के अनुभवों व घटनाओं में, या उससे भी पीछे—के पूर्व जन्मों में जाकर—यह देख लें कि हमें कौन-कौन से कष्ट हुए, तो हम कष्ट से मुक्त हो जाएंगे । पूर्व जन्म में जाने की कोई विधि यह बताती है वहाँ पर जो जो आपके साथ हुआ यदि उसकी एनालिसिस अच्छी तरह से कर लिया जाये तो आपके अंदर समस्त मानसिक और दैहिक कष्ट समाप्त हो सकते हैं । 

मेरे अनुभव में चाहे आप कष्ट देखें या खुशी देखें—आप दोनों से मुक्त नहीं हो सकते,  बल्कि यदि आप कष्ट को देखने लगेंगे, तो आप और कष्ट में चले जाएंगे। 

मान लीजिए कोई व्यक्ति बचपन की घटनाओं को बहुत स्पष्ट रूप से याद रख सकता है। उससे कहिए कि वह अपने बचपन के किसी दुखद अनुभव को याद करे—वह उस घटना को याद करके तुरंत भावुक हो जाएगा, रोने लग सकता है । क्यों? क्योंकि वह उस पुराने अनुभव को वर्तमान में उतनी ही तीव्रता से जीने लगता है। जो घटना 40 वर्ष पहले घटित हुई थी, वही घटना वर्तमान में फिर से सक्रिय हो जाती है — कभी-कभी उससे भी अधिक तीव्र रूप में जीवित हो जाती है । देह की नाड़ी तंत्र में फिर से उसी तरह प्रतिक्रिया करने लगती है।

अब इसे ही और गहराई से देखें। बचपन में शरीर विकसित हो रहा था, इसलिए उस समय जो भी आघात या कठिनाई हुई, शरीर ने धीरे-धीरे उसे सह लिया। लेकिन आज, जब वही व्यक्ति का मन 50–55 वर्ष की आयु में उस घटना को याद करता है और उसी तरह मन में प्रतिक्रिया करता है, तो वह अपने वर्तमान शरीर और अंगों को और अधिक अस्थिर कर देता है। उसका मूल कारण है कि देह बूढ़ी हो रही है और मन के द्वारा दिया जाने वाला प्रतिक्रिया उस बचपन से कहीं अधिक इस वर्तमान में दिया गया । अब शरीर परिपक्व हो चुका है—अब उसमें वह लचीलापन नहीं है जो बचपन में था। परिणामस्वरूप, उस स्मृति के कारण कई दिनों तक भीतर असंतुलन बना रह सकता है—जैसे हृदय गति का बढ़ जाना, बेचैनी आदि।

अर्थात् मन जो अब पचास से पचपन वर्ष के शरीर में बैठा हुआ है वह बचपन वाली प्रतिक्रिया दे रहा है तो यह देह भला कैसे स्वीकार कर पायेगा । यदि मन गंभीर और सीख व ज्ञान से भरा हुआ है तब तो बचपन के मनोप्रभावों से मुक्त हो जाएगा अन्यथा वह उसी प्रतिक्रिया में पड़कर देह और मन को और बीमार कर देगा । 


सत्य तो यह था कि सीख तो वर्तमान में होनी चाहिए थी, जो नहीं हो पाई। भूतकाल की घटनाओं को स्मृति में हरा-भरा करके एमएस को ज्ञान किंचित मात्र भी नहीं मिल सकता है । क्योंकि स्मृति का कार्य ही नहीं है ज्ञान व ज्ञान का अभ्यास । ज्ञान का अभ्यास तो वर्तमान में ही संभव है ।  

इसलिए यह स्वतः सिद्ध है कि भूतकाल में घूमकर, दुख से मुक्ति पाने की कोशिश करना—यह व्यावहारिक नहीं है। क्योंकि जैसे ही आप किसी घटना को देखते हैं, आप अपने “चरित्र व कैरेक्टर” को उसमें डाल देते हैं, और फिर वही दुख उत्पन्न हो जाता है।

आपको यह सीखना था कि वर्तमान में आप अपने अनुभवों से कितना डिटैच हो सकते हैं। जब आप अपने “चरित्र व कैरेक्टर” को किसी घटना से अलग कर पाते हैं, तभी वास्तविक सीख प्रारंभ होती है। यदि वर्तमान में आपने यह 1% भी सीख लिया, तो फिर जब आप 20–30 साल पुराने किसी कठिन अनुभव को याद करेंगे, तो उसमें फर्क दिखाई देगा।

अंततः प्रशिक्षण (training) हमेशा वर्तमान में ही होता है। आप भूतकाल व पूर्व जन्म में जाकर उन घटनाओं को याद करके कुछ भी सीख नहीं सकते हैं  । 

इसी प्रकार, बहुत से युवा साधक ध्यान में बैठकर कल्पना करते हैं—कि भविष्य में उनके साथ कुछ कठिन हो रहा है, शरीर को कष्ट दिया जा रहा है, और वे उससे प्रभावित नहीं हो रहे। लेकिन यह भी केवल कल्पना है। यह वास्तविक प्रशिक्षण नहीं है, बल्कि एक प्रकार की मानसिक योजना या “खयाली अभ्यास” है। यह सकारात्मक है किंतु वास्तविक अभ्यास नहीं है । 

वास्तविक लगाव व आसक्ति और अनासक्ति हमेशा व्यावहारिक ही होती है और वह वर्तमान में ही संभव है । जिस भी घटना से आपको कष्ट हुआ, उसमें आप उस समय पूर्ण रूप से आसक्त थे—इसीलिए कष्ट हुआ।अपने चरित्र को उसमें पूरी तरह से जोड़ लिया था । उसे अलग करने की क्षमता का आभाव था । 

अब आवश्यकता यह नहीं है कि आप उस पुरानी घटना में जाकर अनासक्त हों जो कि संभव नहीं है, बल्कि यह है कि आप वर्तमान में ही अलग होना कैसे सीखें, यह सीखना होगा । क्योंकि अनासक्त किसी विशेष घटना से नहीं, बल्कि मन की एक प्रशिक्षित अवस्था से आता है। जब मन को डिटैच होना आ जाता है, तो वह किसी भी परिस्थिति में स्वयं को अलग कर सकता है।

परंतु अक्सर हम वर्तमान को छोड़कर भूतकाल और पूर्वजन्म में भटकते रहते हैं—कभी इस जन्म के, कभी पिछले जन्मों के। और इस प्रक्रिया में हम वर्तमान समय को ही नष्ट कर देते हैं।

यदि वर्तमान को ही हम साध नहीं पाए, तो फिर रोगों से बचना कठिन हो जाएगा—विशेष रूप से मानसिक (psychological) रोग तो जैसे स्वयं ही आमंत्रण बन जाते हैं।

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