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प्राणायाम:सांसों में जटिलता से रोग

1 month ago By Yogi Anoop

प्राणायाम : सांसों में जटिलता से रोग  

व्यक्ति और जीव जब से इस धरती पर अस्तित्व में आए हैं, तब से श्वास का लेना, उसका रुकना, फिर छोड़ना और पुनः रुक जाना—यह क्रम स्वाभाविक रूप से चलता आ रहा है। यह कोई नई खोज नहीं है, न ही किसी विशेष विद्या की देन। यह तो जीवन का मूल स्वाभाविक स्पंदन है। साँसे वही हैं जो सबमें चल रही है किंतु उसे देखने का दृष्टिकोण क्या है । प्रकृति अपने नियम छिपाती नहीं, छिपा होता है केवल हमारा देखने का दृष्टिकोण। जैसे सेब का पृथ्वी की ओर गिरना कोई नई घटना नहीं थी, नई थी उस गिरने में निहित नियम की पहचान। सेब का गिरना नहीं, उससे प्राप्त हुआ बोध ही खोज था।

उसी प्रकार साँसे तो चल ही रही सबमें , किंतु दृष्टिकोण किसका कैसा है । साँसों में कोई भगवान व परमात्मा देखता है , कोई आत्मा देखता है , कोई प्राण शक्ति देखता है । ये सभी तरीके मन को एकाग्र करें के लिए ही होते हैं । किंतु हठ योग में सांसों प्राणशक्ति पर ध्यान देते हुए गिनती पर ध्यान दिया गया । वह इसलिए क्योंकि उनका उद्देश्य चिकित्सा था ।  

उन्होंने प्राणायाम में गणितीय 2-4-8, 4-8-16 जैसी पड़ती बता कर मानसिक अनुशासन बनाने पर जोर दिया । प्रारंभ में यह अनुशासन के लिए उपयोगी रही होगी, क्योंकि मन को एक ढाँचे में लाने के लिए नियम आवश्यक होते हैं। परंतु समस्या वहाँ उत्पन्न होती है जहाँ इस अनुशासन को ही लक्ष्य मान लिया जाता है और उसी को और अधिक जटिल बनाने की विधियाँ गढ़ी जाने लगती है । प्राणायाम के कुछ अभ्यासी तो 5-10 मिनट तक अंतर व वाह्य कुंभक का अभ्यास करने लगते हैं । 

सत्य तो यह है कि स्वाभाविक प्रक्रिया धीरे-धीरे एक जबरदस्ती के अभ्यास में बदलती चली गई। इसमें विवेक कम हठ ज़्यादा दिखने लगा । कुछ ऐसे ही जैसे जिम में मांसपेशियों को बनाने में लग जाते हैं । जो प्रक्रिया केवल साधन थी, वही साध्य बन गई। 

श्वास का गणित बढ़ता गया, नियमों की परतें चढ़ती गईं और भीतर होने वाला बोध पीछे छूटता चला गया। जटिलता को ही गहराई समझ लिया गया। जबकि सत्य यह है कि यह जटिलता ही धीरे-धीरे रोग का रूप ले लेती है—मन के लिए भी और देह के लिए भी। क्योंकि बोध का समापन जटिलता में हो जाता जब कि बोध की जागृति सरलता में ही संभव है । 

यदि कोई व्यक्ति अस्सी वर्ष का जीवन जी ले और उस पूरे जीवन में वह श्वास के साथ केवल 2-4-8-16 जैसे गिनती के सिद्धांत को ही साधता रहे, तो यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि उसकी बुद्धि और उसकी चेतना कहाँ व्यस्त रही। क्या जीवन भर उसने केवल संख्या पकड़ी और अनुभव को खो दिया? यह वैसा ही है जैसे पेड़ से सेब गिरने की घटना। संसार में लगभग हर व्यक्ति ने किसी न किसी वस्तु को पेड़ से गिरते हुए देखा है, परंतु सभी ने उसे एक ही दृष्टि से नहीं देखा। किसी ने उसे सामान्य घटना माना, किसी ने संयोग, और किसी एक ने उसी घटना में प्रकृति का नियम देख लिया।

प्राणायाम में भी आज वही खेल चल रहा है। श्वास तो सभी ले रहे हैं, रुक भी रही है, चल भी रही है। पर किसी का ध्यान संख्या पर अटका है, किसी का तकनीक पर, किसी का प्रदर्शन पर। बहुत कम लोग यह पूछते हैं कि इन श्वासों के माध्यम से मेरे भीतर क्या बोध घटित हो रहा है। ध्यान श्वास से मिलने वाले अनुभव पर नहीं, बल्कि श्वास को साधने की विधि पर केंद्रित हो गया है।

ऐसा प्रतीत होता है मानो हमें प्राणायाम नहीं, बल्कि प्राणायाम के भीतर छुपा हुआ गणित पढ़ाया जा रहा हो। श्वास एक माध्यम है—बोध तक पहुँचने का, स्थिरता तक पहुँचने का, स्वयं के साक्षी बनने का। पर जब माध्यम ही लक्ष्य बन जाए, तब यात्रा रुक जाती है। तब व्यक्ति श्वासों को गिनता तो रहता है, पर स्वयं का बोध नहीं कर पाता है ।

वास्तविक प्रश्न यह नहीं है कि आपने कितनी देर श्वास रोकी, कितनी मात्रा में ली या छोड़ी। वास्तविक प्रश्न यह है कि उन श्वासों के बीच आपके भीतर क्या बदला, क्या ढीला पड़ा, क्या शांत हुआ, क्या स्पष्ट हुआ। यदि श्वास के माध्यम से बोध नहीं बढ़ा, तो फिर आप कुछ और ही समझ रहे हैं—प्राणायाम नहीं।

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