प्राणायाम, खोज और बोध का भ्रम
ज्यादातर प्राणायाम के नाम पर जो कुछ चल रहा है, वह साधना कम और बौद्धिक प्रदर्शन अधिक है। अनेक गुरु प्राणायाम में अनावश्यक संरचनाएँ जोड़ते जा रहे हैं—इसलिए नहीं कि वे आवश्यक हैं, बल्कि इसलिए कि उन्हें “नई खोज” कहा जा सके। जटिलता को खोज का प्रमाण बना दिया जाता है। सामान्य व्यक्ति भी इसी भ्रम में पड़ जाता है कि जो अभ्यास जितना कठिन और उलझा हुआ है, वह उतना ही श्रेष्ठ होगा।
यह खोज नहीं है। यह विकृति है। यह विध्वंस है।
प्रकृति सरल है। जो साधना प्रकृति से दूर ले जाए, वह साधना नहीं, अनावश्यक हस्तक्षेप है। खोज वह नहीं जो कृत्रिम बनायी जाए; खोज वह है जिसमें प्रकृति का बोध घटित हो जाए। मैं खोज को निर्माण नहीं, बोध कहता हूँ।
प्राणायाम को गणितीय सूत्रों में बदल देना—दो सेकेंड अंदर, चार सेकेंड रोक, आठ सेकेंड बाहर, सोलह सेकेंड बाहर रोक—इसे सिद्धांत कहा जाता है। पर यह केवल यांत्रिक अनुकरण है। इसमें न समझ है, न संवेदना, न बोध। देह कोई घड़ी नहीं है कि सेकेंडों में बाँध दी जाए। देह जीवित है, संवेदनशील है, और उसकी लय प्रत्येक व्यक्ति में भिन्न है।
वास्तविक खोज तब होती है जब साधक यह देख पाता है कि श्वास भीतर जाते समय देह में क्या घट रहा है। कितनी संतुष्टि उत्पन्न हुई। श्वास के रुकने पर कितना विराम उतरा। उस विराम व विश्राम में विचार शांत हुए या नहीं। श्वास बाहर निकलते समय क्या मन और मस्तिष्क ने वास्तव में कुछ छोड़ा, या केवल आदेश का पालन किया।
और श्वास के बाहर निकल जाने के बाद—क्या आपने उस शुद्ध शांति को अनुभव किया, क्योंकि किसी भी अनावश्यक पदार्थ के बाहर निकल जाने के बाद छोड़ने की अनुभूति तो होती ही है । वह हो रही है अथवा नहीं ।
जो किसी क्रिया से नहीं, छूट जाने से उत्पन्न होती है? वही क्षण निर्णायक होता है। वही क्षण बोध का होता है।
यदि श्वास छोड़ने के बाद केवल सुख शेष रह जाता है, और आप उस सुख को बिना हस्तक्षेप के अनुभव कर पाते हैं— तो वही खोज है। उसमें यह देह की प्रकृति , मन बुद्धि की प्रकृति का अनुभव हो जाता है । इसी अनुभव को ही तो बोध कहते हैं , इसी अनुभव को विज्ञान में खोज कहते हैं ।
बाक़ी सब अभ्यास है, अनुशासन है, तकनीक है—बोध नहीं। यदि आपके प्राणायाम ने आपकी समझ नहीं बढ़ाई, यदि वह आपको अधिक सजग, अधिक सरल, अधिक शांत नहीं बना रहा, यदि प्रकृति का ज्ञान नहीं हो रहा है तो स्पष्ट समझ लीजिए— आप साधना नहीं कर रहे, आप केवल अबोध को परिष्कृत कर रहे हैं।
और परिष्कृत अबोध अंततः रोग ही बनता है। यहाँ तक कि यह परिष्कृत अबोध बड़ी बड़ी बीमारियां देने लगता है ।
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