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पकड़ में ही रोग है

1 week ago By Yogi Anoop

पकड़ में ही रोग है 

“मैंने सब कुछ छोड़ दिया है”—यह वाक्य जितना सरल लगता है, उतना ही छलपूर्ण भी है। क्योंकि प्रायः जिसने यह कहा होता है, उसने छोड़ा कुछ भी नहीं होता; उसने केवल पकड़ बदल ली होती है। पहले वह संसार को पकड़े था, अब वह गुरु और ईश्वर को पकड़े हुए है। रोग तो पकड़ने का ही है—वस्तु बदल जाने से रोग नहीं बदलता।

बंदर जब एक डाल छोड़कर दूसरी डाल पकड़ता है, तो उसे त्याग नहीं कहते। उसका उद्देश्य छोड़ना नहीं होता, उसका उद्देश्य तो अगली डाल पकड़ना होता है। ठीक यही मनुष्य के साथ घटित होता है। वह देह के किसी अंग को पकड़े रहता है—खींचता रहता है; किसी एक विचार, किसी एक भावना, किसी एक मान्यता को पकड़ लेता है और फिर उसी को दिनों, महीनों, वर्षों तक पकड़े रहता है।

विचित्र यह है कि उसे यह भी पता नहीं चलता कि वह पकड़े हुए है। ऊपर से वह यह अभिनय करता रहता है कि उसने सब कुछ ईश्वर पर छोड़ दिया है। यह अभिनय ही उसका सबसे बड़ा भ्रम बन जाता है। और उस भ्रम के भीतर जितना दुःख भोगा जाता है, उसका हिसाब कोई नहीं रखता।

मैं कहता हूँ—यदि छोड़ना है तो दुःख और कष्ट को भी उसी ईश्वर पर छोड़ दो। किंतु वहाँ भी मन छोड़ता नहीं, वहाँ भी वह केवल अनुनय करता है। वह कहता है—“हे ईश्वर, इसे ले लो”, पर भीतर से उसे पकड़े रहता है। यही कारण है कि छोड़ने की सारी प्रक्रिया केवल शब्दों में घटित होती है, अस्तित्व में नहीं।

तुम गुरु के शब्दों को दिन-रात पकड़े हुए हो। तुम उसे जप बना चुके हो। क्या यह पकड़ नहीं है? यह तो सबसे सूक्ष्म और सबसे कठोर पकड़ है। गुरु ने कहा—“सब कुछ ईश्वर पर छोड़ दो।” और तुमने ईश्वर को ही पकड़ लिया । अब दिन-रात उसे जप की तरह निरंतर तीव्र गति से स्वतः चलाने का प्रयत्न कर रहे हो । तुम्हें लगता है कि उस प्रक्रिया को स्वतः चलायमान कर दिया किंतु वास्तव में यह और खतरनाक है । क्योंकि उसे तुमने स्वतः चलायमान बना दिया अर्थात् इसे ऑटोइम्यून कर दिया है ।   

मन के द्वार अब तो ईश्वर शब्द की  पुनरावृत्ति भी घुटन में पैदा कर देगा । यद्यपि वह विश्वास की प्रमुखता के कारण उसे उसकी पुनरावृत्ति पर शंका नहीं होती किंतु वास्तविक कारण तो मन की पुनरावृत्ति ही है । 

सत्य तो यह है कि तुम इसे पकड़ना मानते ही नहीं, क्योंकि आँखों पर पर्दा पड़ा हुआ है। यदि सच में तुमने सब कुछ छोड़ दिया है, तो फिर उसे दिन-रात क्यों दोहराते हो ? उसे क्यों रटते हो? इसके पीछे की मनोवृत्ति यह हो सकती है कि तुम अपने भय को उसकी पुनरावृत्ति से शांत करने का प्रयत्न करते हो । 

जो वास्तव में छोड़ देता है, वह निश्चिंत हो जाता है। छोड़ने के बाद पुनरावृत्ति का बंद होना निश्चित है । उसके मन में कुछ भी नहीं चलता—न विचार, न भय, न आशा, न पकड़ क्योंकि पकड़ छोड़ने के बाद जो अनुभव घटित होगा उसे ही वह अनुभव कर रहा होता है । 

छोड़ने से जो आत्मसंतोष उत्पन्न होता है, वही मुक्त अवस्था का संकेत है। उस आत्मसंतोष में कुछ पाने की इच्छा नहीं रहती, क्योंकि भीतर कुछ छूटा हुआ नहीं होता। आत्मसंतोष का अर्थ ही है—छुटा हुआ होना, भार से रहित होना।

अपने रोगों को देखो। और यदि गहराई से देखो तो पाओगे कि सबसे बड़ा रोग देह का नहीं, नासमझी का है। वही नासमझी देह में रोग रचती है। जब तक उस नासमझी को समझा नहीं जाएगा, तब तक किसी औषधि, किसी उपाय, किसी प्रार्थना से कुछ भी ठीक नहीं होगा।

समझ ही उपचार है। और समझ के बिना किया गया हर त्याग—केवल एक नई पकड़ है।

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