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ओवरऑक्सीजनेशन के खतरे

5 hours ago By Yogi Anoop

प्राणायाम में अति: ओवरऑक्सीजनेशन के खतरे और सही अभ्यास

आजकल बहुत से लोग प्राणायाम को स्वास्थ्य का सर्वोत्तम उपाय मानकर उसे अत्यधिक मात्रा में करने लगते हैं। वे लंबी-गहरी सांस लेने को जितना अधिक करेंगे, उतना अधिक लाभ मिलेगा—ऐसा मान लेते हैं। लेकिन यही अति, यानी “ओवर इनहेलेशन” या “ओवरऑक्सीजनेशन”, शरीर और मन के लिए हानिकारक हो सकती है।

ओवरऑक्सीजनेशन का अर्थ है शरीर में आवश्यकता से अधिक ऑक्सीजन भरना। ऐसी स्थिति में व्यक्ति को लगने लगता है कि उसका मन स्थिर नहीं है, बल्कि जैसे वह उड़ रहा है। वह वास्तविकता से थोड़ा कटने लगता है, ध्यान भटकता है और भूलने की समस्या भी महसूस होने लगती है। इसका कारण यह है कि मस्तिष्क और नर्वस सिस्टम पर ऑक्सीजन का दबाव बढ़ जाता है, जिससे असंतुलन पैदा होता है।

अत्यधिक प्राणायाम करने वाले लोगों में अक्सर यह देखा जाता है कि वे अपने फेफड़ों पर जरूरत से ज्यादा जोर डालते हैं। यह आदत कई बार बिना समझ के विकसित हो जाती है, क्योंकि उन्हें बताया जाता है कि जितना अधिक प्राणायाम करेंगे, उतनी लंबी और स्वस्थ जीवन जी पाएंगे। परिणामस्वरूप, वे हर समय गहरी सांस लेने का प्रयास करते रहते हैं, जो खतरनाक हो सकता है।

योग के अनुसार, शरीर में पांच प्रकार की प्राण वायु होती हैं—प्राण, अपान, समान, उदान और व्यान। जब ओवरऑक्सीजनेशन होता है, तो ये सभी प्राण असंतुलित हो जाते हैं। साथ ही इड़ा, पिंगला और सुषुम्ना नाड़ियों का संतुलन भी बिगड़ सकता है।

यह समझना जरूरी है कि भोजन का अत्यधिक सेवन (ओवरईटिंग) भी नुकसानदायक है, लेकिन उसका प्रभाव अपेक्षाकृत स्थूल (gross) स्तर पर होता है। जबकि ओवरऑक्सीजनेशन सूक्ष्म (micro) स्तर पर शरीर को प्रभावित करता है, और इसका प्रभाव अधिक गहरा और जटिल हो सकता है।

इसके लक्षणों में सिरदर्द, आंखों में दर्द, भ्रम (dizziness), झूठे आभास (illusion), छाती में भारीपन, माथे और कनपटियों में दबाव, सिर के ऊपरी हिस्से (क्राउन) में तनाव, और कभी-कभी बेहोशी या ब्लड प्रेशर का बढ़ना शामिल हैं।

प्राणायाम करते समय एक महत्वपूर्ण नियम यह है कि इनहेलेशन (सांस अंदर लेना) और एक्सेलेशन (सांस बाहर छोड़ना) को समान पैटर्न में नहीं रखना चाहिए। दोनों में एक जैसा समय और समान बल लगाने से शरीर पर अनावश्यक दबाव पड़ता है।

सही अभ्यास यह है कि एक तरफ प्रयास (effort) हो और दूसरी तरफ विश्राम (rest)। उदाहरण के लिए, यदि सांस अंदर लेने में बल लगा रहे हैं, तो बाहर छोड़ते समय सहज रहें, और यदि बाहर छोड़ने में बल है, तो अंदर लेते समय सहजता रखें।

विशेष रूप से भस्त्रिका जैसे प्राणायाम, जिसमें दोनों ओर बल लगाया जाता है, उसे मुख्य अभ्यास नहीं बनाना चाहिए। इसका उपयोग केवल सीमित समय और विशेष उद्देश्य, जैसे डिटॉक्सिफिकेशन, के लिए करना चाहिए। यदि इसे नियमित और मुख्य अभ्यास बना लिया जाए, तो यह लाभ की बजाय हानि पहुंचा सकता है।

अंततः, प्राणायाम का उद्देश्य शरीर और मन को संतुलित करना है, न कि उन पर अतिरिक्त दबाव डालना। संतुलित, जागरूक और सीमित अभ्यास ही स्वास्थ्य और मानसिक शांति का वास्तविक मार्ग है।


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