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नींद: नींद क्यों नहीं आती

2 weeks ago By Yogi Anoop

नींद: नींद क्यों नहीं आती


नींद (निद्रा) जो एक तरह से Unknown Land है, मनुष्य के जीवन की सबसे पुरानी पहेली है — इतनी पुरानी कि हम उसे पहेली मानना ही भूल गए हैं। हर रात हम एक अनजान देश में उतरते हैं, बिना यह जाने कि रास्ता कहाँ से शुरू होता है। एक सामान्य मन नींद को लेकर बस एक ही प्रश्न जानता है — "नींद नहीं आ रही।" परंतु सच यह है कि नींद के भीतर हज़ारों प्रश्न छिपे हैं, और हर प्रश्न मनुष्य के मन की किसी न किसी परत को खोलता है।


जो समाधान वास्तव में सार्थक हैं, वे बाहर से नहीं आते। कोई औषधि, कोई पेय, कोई बाहरी युक्ति नींद को स्थायी रूप से नहीं ला सकती। सच्चा समाधान वही है जिसे अंतरतम अपनी आवश्यकताओं के लिए स्वयं खोजे, जिसे इंद्रियाँ और देह स्वयं अनुभव करें। जो भीतर से उपजे, वही स्थायी है — शेष सब अस्थायी सांत्वना मात्र है। यही नींद की सबसे गहरी सच्चाई है, और यही इस चिंतन की नींव है।


भय की जड़ — जब मन शांत होना भूल जाता है


एक ऐसा मन जो स्वभाव से चिंतित और अशांत है, वह हर कार्य से पहले ही भीतर एक हलचल जी मनो-भूचाल जैसा होता है, महसूस करने लगता है। यह हलचल किसी घटना से नहीं, बल्कि उस घटना के बारे में मन की अनगिनत कल्पनाओं से जन्म लेती है — क्या होगा, क्या नहीं होगा, समाधान मिलेगा या नहीं। वह भी सोने के पहले बिस्तर पर ही । यह प्रश्नों की भीड़ भीतर एक शोर पैदा करती है, और उसी शोर में भय बैठा होता है।


यही प्रक्रिया रात में, बिस्तर पर लेटते ही दोहराई जाती है। दिनभर की उलझनें, प्रश्न, आशंकाएँ — सब उसी क्षण मन में उमड़ने लगती हैं जब शरीर विश्राम चाहता है। मन उस देह से कुछ घंटों के लिए अलग होना चाहता है । अंतरतम पूरी तरह से उस देश में स्थिर होना चाहता है जहाँ क्कीसी देश और काल का महत्व नहीं है । किंतु विडंबना यह है कि जिस समय शरीर शिथिल होना चाहता है, ठीक उसी समय मन सबसे अधिक सक्रिय हो उठता है। मस्तिष्क सतर्क अवस्था में चला जाता है, मानो कोई खतरा सामने हो — जबकि खतरा कहीं बाहर है ही नहीं, केवल मन द्वार निर्मित विचारों की भीड़ है।


और यहीं से नींद के प्रति एक नया भय जन्म लेता है — भय स्वयं भय का — "नींद आएगी या नहीं आएगी" का चक्र। यह प्रश्न ही अपने आप में नींद की सबसे बड़ी बाधा बन जाता है। जो व्यक्ति सचमुच थका हुआ है, उसके भीतर मन और शरीर स्वयं ही शिथिलता की मांग करते हैं — बिना किसी प्रयास के। परंतु जिनके भीतर यह सूक्ष्म घबराहट बैठी है, उनके लिए यह स्वाभाविक शिथिलता कठिन हो जाती है, क्योंकि वे विश्राम की जगह विचार में उलझ जाते हैं।


स्वाश-प्रश्वास का मार्ग — विचार से अनुभव की ओर


समाधान की तलाश बाहर नहीं, भीतर की एक सूक्ष्म कला में है — विचार से हटकर अनुभव की ओर लौटना। जैसे ही बिस्तर पर लेटा जाए, पहला काम यह है कि नींद के आने या न आने पर कोई विचार ही न किया जाए। मन को किसी ऐसे विषय पर टिकाया जाए जो उसे विचारशून्य बना दे, न कि उसे और अधिक उलझाए।


सांस इसके लिए सबसे सहज माध्यम है। सांस न कोई विचार मांगती है, न कोई निर्णय — वह बस है। मन को सांस के आने-जाने का साक्षी बनाया जाए, विशेष रूप से सांस के छूटने पर ध्यान दिया जाए। यहाँ एक गहरी बात छिपी है — सांस को छोड़ने की कोई आवश्यकता नहीं, क्योंकि फेफड़े स्वयं ही सांस को छोड़ते हैं, बिना किसी अनुमति के । उन फेफड़ों को छोड़ने के लिए मन की अनुमति नहीं चाहिए । यदि चाहिए होती तो यह मनुष्य का जीवन तो कुछ ही पलों ही रह जाए ।  मनुष्य केवल इतना समझने का प्रयास करना है कि यह छोड़ना, यह विसर्जन, कैसे अपने आप घटित हो रहा है।


यह समझना ही असली ध्यान है — यह जानना कि शरीर की सबसे मौलिक क्रिया भी हमारी इच्छा से परे, अपने आप स्वतः चल रही है। जैसे ही मन इस सहज प्रवाह को समझने में लगता है, वह स्वयं को मन नहीं बल्कि बुद्धि की श्रेणी में स्थानातरण कर लेता है ,  वह विचारों की पकड़ से स्वयं को मुक्त करके गहन विश्राम में उतरने लगता है। यही वह क्षण है जब नींद स्वयं आ जाती है — बिना बुलाए, बिना मांगे। विश्राम की अवशतः जितनी बढ़ती जाति है , नींद के आने व जाने की समस्या का समाधान होता जाता है । यहाँ तक कि यह समझ उस गहन निद्रा तक की यात्रा को भी अच्छी तरह से जागृत होकर अनुभव करवा डेटा है । मेरे अनुभव में इसी गहन निद्रा को समझन ही तो ध्यान व समाधि है । 


मेरे प्रयोग —विरोधाभास की युक्ति — जब मन को छल से समझाना पड़े


मन सदा सीधी राह पर नहीं चलता। ज्यादातर वह उलटी दिशा में अधिक सहज गति करता है। जिस व्यक्ति को महीनों से नींद नहीं आती थी, उसे एक प्राणायाम की ऐसी क्लिष्ट विधि सिखाया जिससे उसके मन में एक हल्का भय पैदा हुआ — उसने कहा कि "यह तो बड़ी लंबी और थकाऊ प्रक्रिया है।" और उसी भय के सहारे, जैसे ही वह बिस्तर पर लेटता, नींद स्वयं आ जाती।

यह ठीक वैसा ही है जैसे कोई छोटा बच्चा रात में सोने से इनकार करता है, परंतु जैसे ही उसे किताब पढ़ने को कह दिया जाए, वह स्वयं ही नींद के आगोश में चला जाता है। मन की यह प्रकृति है — जहाँ उसे बलपूर्वक कुछ करने को कहा जाए, वहाँ वह विद्रोह करने के बजाय वह उसके विपरीत कुछ अकड़ने लगता है । जहाँ उसे स्वतंत्र छोड़ दिया जाए, वहाँ वह स्वाभाविक रूप से स्वयं को अशांत करने पर तूल जाता है । किंतु यह बाल-सुलभ युक्ति केवल एक सतही समाधान है, स्थायी नहीं। जो व्यक्ति परिपक्वता की ओर बढ़ना चाहता है, उसे इससे आगे जाना होगा — उसे सोने और जागने के भेद को ही विलीन करना होगा। 


यहीं पर गहनतम सत्य प्रकट होता है — साधारण मन का अनुभव करने का दायरा बहुत सीमित होता है। जैसे ही वह इस दायरे को विस्तार देने का प्रयास करता है, आरंभ में वह उसे सहन नहीं कर पाता, शिथिलता व विश्राम को अनुभव कर पाना बहुत ही मुश्किल कार्य अहि । यह तो ध्यानियों को भी बहुत सुलभता से प्राप्त होने वाली नहीं होती हैं । 

किनकी मन अपने द्वार दिए गए तनाव की सीमाओं को स्वयं तोड़ता है । किंतु जब शरीर और मन को गहन संतोष मिलता है, तो शरीर स्वयं शिथिल हो जाता है, और मन शरीर से अपने आप अलग हो जाता है — दोनों एक-दूसरे को स्वतः मुक्त कर देते हैं।

इसीलिए अमीन हमेशा कहता हूँ कि नींद को बुलाने की आस्वह्यकता नहीं होती है । वह तो परिणाम है , वह स्वतः ही आती है । विश्राम का अनुभव करना मात्र देखना होगा । याददापि यह सीखने जैसी कोई वस्तु नहीं है , यह तो स्वयं का स्वभाव है जिसे हैमेंस अनुभव करना है । 


यही परफेक्ट हीलिंग है — न कोई बाहरी औषधि, न कोई कृत्रिम उपाय, बल्कि मन की अपनी सहज वापसी अपने भीतर।


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