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नींद का खेल — प्रयास से परे एक विश्राम

4 days ago By Yogi Anoop

नींद का खेल — प्रयास से परे एक विश्राम

प्रश्न बहुत साधारण प्रतीत होता है—जब तुम बिस्तर पर जाते हो, तो सोने का प्रयत्न ही क्यों करते हो? पर इस साधारणता के भीतर एक सूक्ष्म जाल छिपा है। क्योंकि जहाँ “प्रयत्न” है, वहाँ सहजता नहीं रह सकती। प्रयत्न का अर्थ ही है कि तुम किसी स्वाभाविक घटना को अपनी इच्छा से नियंत्रित करना चाहते हो। स्वाभाविक घटना को ऐक्षिक हरकतों से कभी भी प्राप्त  नहीं किया जा सकता है । चाहे क्यों न वह अच्छी अच्छी बाते ही क्यों न हों । यहीं से असंतुलन प्रारम्भ होता है। 

नींद कोई क्रिया नहीं है, जिसे किया जाए। यह कोई उपलब्धि नहीं है, जिसे अर्जित किया जाए। यह तो एक ऐसी अवस्था है जहाँ कोई क्रिया नहीं होती है । और यह भी सिद्ध है कि क्रिया से अक्रिया को प्राप्त करना संभव नहीं है । तो भला उसे प्राप्त कैसे किया जा सकता है । मेरे अपने अनुभव में सत्य कहूँ तो उसे प्राप्त नहीं किया जा सकता है । क्योंकि प्राप्त शब्द में कहीं न कहीं मन की इक्षा जुड़ा हुआ है । प्राप्त शब्द में प्रयास व प्रयत्न व क्रिया जुड़ा हुआ है । जब कि नींद एक परिणाम है , जहाँ कोई प्रयत्न नहीं होता है । 

जैसे कोई बहुत जयादा दूर तक दौड़े और दौड़ने जैसी क्रिया करने के बाद जब वह आराम की अवस्था में आता है तो वास्तव में उसे अक्रिया की अवस्था नहीं कहा जा सकता है । यह थकान का विपरीत है । किंतु नींद में ऐसा नहीं होता है । यह एक अवस्था जो थकान के बाद नहीं आती है । यह मन और देह की स्वाभाविक परिणति है जो बिना थकान के भी आती है । 

जब तुम कहते हो—“मैं सोने की कोशिश कर रहा हूँ।” तो यह वाक्य अपने भीतर विरोधाभास लिए होता है। क्योंकि “कोशिश” जागृति की क्रिया है, और “नींद” उस क्रिया का अभाव। जब तक कोशिश बनी रहती है, तब तक जागृति भी बना रहता है। इस प्रकार तुम उसी दरवाज़े पर दस्तक देते रहते हो, जो केवल तब खुलता है जब दस्तक देना बंद हो जाए। 

तुमने मज़ाक में कहा—तो क्या मैं बिस्तर पर खेलने जाऊँ? पर यदि सूक्ष्म दृष्टि से देखा जाए, तो तुम पहले से ही बिस्तर पर लेटे लेटे खेल रहे हो। शरीर भले ही स्थिर पड़ा हो, पर मन भीतर निरंतर गति में है। विचार उछलते हैं, स्मृतियाँ लौटती हैं, कल्पनाएँ आकार लेती हैं—यह एक अदृश्य खेल है, जो बिना रुके चलता रहता है।

समस्या इस खेल में नहीं है। समस्या तब उत्पन्न होती है जब एक ही समय में एक ही अवस्था को प्राप्त करने के लिए मन दो दिशाओं में विभाजित हो जाता है।  एक भाग चाहता है कि अब सब शांत हो जाए, नींद आ जाए। और दूसरा भाग उसी क्षण सक्रिय बना रहता है—विचारों में उलझा हुआ। यह आंतरिक द्वंद्व ही अशांति का कारण है। जब भीतर दो धाराएँ विपरीत दिशा में बहती हैं, तो निद्रा रुक जाता है।

नींद का न आना वास्तव में किसी कमी का संकेत नहीं है, बल्कि इस आंतरिक विभाजन का परिणाम है। तुम एक ही समय में दो विपरीत अवस्थाओं को थामे रखना चाहते हो—जागना भी और सोना भी। और यही असंभव प्रयास तुम्हें थका देता है।

तो फिर उपाय क्या है?

उपाय किसी नई क्रिया में नहीं है। उपाय इस पूरे खेल को समझने में है। यदि तुम इस भीतर चल रहे खेल को देखने लगो—बिना उसे रोकने की कोशिश किए, बिना उसमें उलझे—तो एक नई संभावना जन्म लेती है। यह देखना ही धीरे-धीरे उस खेल की गति को कम कर देता है।

जब तुम विचारों को भगाने का प्रयास नहीं करते, तब इसका मूल अर्थ है कि विचारों को ऊर्जा देना बंद कर देते  हो । जैसे ही विचारों को भगाते हो वैसे ही आप स्वयं ही अप्रत्यक्ष रूप से उसको ऊर्जा दे देते हो । और जैसे ही आप स्वयं प्रतिरोध हटा देते हो, वैसे ही विचार सुख जाते हैं , उनके पानी का स्रोत बंद कर दिया । और खेल स्वतः धीमा होने लगता है और अंततः समान हो जाता है । 

और फिर एक ऐसा क्षण आता है, जब आप स्वतः उस गहन निद्रा की अवस्था में चले जाते हो । इसलिए नींद का रहस्य किसी तकनीक में नहीं, बल्कि इस समझ में है कि जो स्वाभाविक है, उसे प्रयास से नहीं पाया जा सकता। उसे केवल होने दिया जा सकता है । 


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