मैं धनवान हूँ: मैनिफ़िस्टेशन में सोचना सबसे सस्ता निवेश है ।
कल्पना में सबसे सस्ता निवेश होता है—क्योंकि इसमें न श्रम लगता है, न जोखिम, न उत्तरदायित्व।
कल्पना के बारे में जो बातें कही जाती हैं—कि अंतरतम से माँगो तो कायनात दे देती है, कि स्वयं को धनवान अनुभव करो तो धन चला आता है—बस शर्त यही है कि गहराई से माँगना है तुम्हें ।
ये बातें सुनने में आकर्षक हैं, पर इनके पीछे छिपी वृत्ति को समझे बिना ये आध्यात्मिक कम और मनोवैज्ञानिक अधिक हो जाती हैं। यहाँ प्रश्न यह नहीं है कि गहराई से की गई कल्पना काम करती है या नहीं, बल्कि यह है कि मन क्यों कल्पना को इतना पसंद करता है।
मनो कल्पना मन के लिए सबसे सुरक्षित क्षेत्र है। वहाँ न असफलता का डर है, न श्रम की थकान, न समय की प्रतीक्षा। वहाँ कोई घेरा नहीं नहीं , कोई सीमा नहीं है । सामने वाले व्यक्ति के बारे में कितनी ही बुराई सोचो उसको आभाष होना नहीं है । वह इसलिए कि सिर के अंदर ही अंदर सब कुछ चल रहा होता है , बाहर तो कोई देख पाता नहीं है । यदि हर व्यक्ति दूसरे व्यक्ति के मन में क्या कल्पना चल रही है देख लेता तो सोचो कि सारे संबंध ही समाप्त हो जाते । इसीलिए मन मस्तिष्क के अंदर सीमावर्ती अवस्था में कल्पना करने के लिए स्वतंत्र है ।
मन वहाँ तुरंत “हो चुका हूँ” का अनुभव करने भी स्वतंत्र है—बिना यह जाँचे कि वास्तव में कुछ घटा भी है या नहीं। यही कारण है कि “मैं धनवान हूँ” कहना, “मैं धनवान हो रहा हूँ” की तुलना में अधिक सुख देता है। पहले में प्रक्रिया नहीं है, संघर्ष नहीं है—सिर्फ़ एक भावनात्मक घोषणा है। मन को परिणाम चाहिए, साधना नहीं।
यही है मैनिफ़िस्टेशन का मूल सिद्धांत । कि सोचो कि मैं धनवान हो चुका हूँ , और उसी के आधार पर वास्तविकता में आप धनवान होने लगते हैं । किंतु कल्पना और सोचने मात्र से कि आप धनवान हो चुके कैसे धनवान होने लगेंगे । यह तर्क, ज्ञान और व्यवहार से ऊपर की प्रक्रिया दिखती है । यही उन्ही लोगों को दिख सकती है जो धन कमाने के लिए मेहनत करने से बचना चाहते हैं ।
यह सोचना ही कि “मैं धनवान हो चुना हूँ” का अर्थ ही है कि आप समस्या में हैं । आप की अन्तरतम को तो ज्ञात है ही कि आप धनवान नहीं हैं । तभी तो कह रहे हैं कि “आप धनवान हो चुके हैं’ किसी धनवान व्यक्ति के मुख से यह सुना है कि वह यह बोले ।
यहाँ तक कि किसी धनवान व्यक्ति के मुख से धन कैसे कमाया जाय आप नहीं सुने होंगे । वैसे सत्य तो यह है कि धन कमाने की कोई एक चाभी तो है नहीं , उसमें कर्म है , जोखिम है , चालाकी , बुद्धि है समय के साथ चलना है । अनेकों बातें छिपी हुई होती हैं जिसे समय के अनुरूप करते हुए आगे बढ़ाना पड़ता है न कि बैठे बैठे मैनिफ़िस्टेशन करके धन की प्राप्ति कर लो । मात्र गहराई से की गई कल्पना से धन का आना संभव नहीं , यह व्यावहारिक है ही नहीं ।
यह प्रवचन में अच्छा लग सकता अहि , यह उन लोगो के लिए अच्छा है जो इस प्रकार के प्रवचन देकर थोड़ा बहुत पैदा कमा सकते हैं किंतु उनसे अधिक मूर्ख जानता है जो इन पर विश्वास करती है ।
एक अन्य उदाहरण से भी इसे समझने का प्रयास करते हैं । —
यदि कोई भूखा व्यक्ति गहराई और सिद्धत से कल्पना करे कि “वह भोजन से तृप्त हो गया है” ,तो क्या इसका अर्थ यह समझा जाये कि उसके अंदर भोजन चला गया है । क्या उसे भोजन पाने के लिए उपाय बंद कर दिए जाने चाहिए । भोजन स्वतः नहीं आयेगा । एक भूखा व्यक्ति यह सोचेगा भी कैसे कि वह तृप्त हो गया है । उसके घर में बच्चे तड़प रहे हैं , वह तड़प रहा है और तुम कहते हो कि सोचो कि तुम ट्रिप हो गए हो । और शिद्दत से सोचो ।
जिसका पेट भरा है वह भोजन के बारे में सोचेगा ही नहीं , और पेट भरने के लिए प्रयास विवेक के द्वारा ज्ञानेन्द्रियों और कर्मेन्द्रियों की सहायता से ही हो सकती है न कि उनकी सहायता न लेकर ।
संभव है कि उनके कहने के पीछे का कोई और मंतव्य हो जैसे कहा जाता है—“बड़ा माँगो, सूर्य को धरती पर ले आओ”—तो यह कथन यथार्थ नहीं, मन की सर्वशक्तिमान कल्पना को सहलाने का प्रयास बन जाता है। मन को यह अच्छा लगता है कि वह कुछ भी माँग सकता है, भले ही उसका कोई संबंध क्रिया, कारण या संतुलन से न हो।
यहाँ मूल समस्या माँगने में नहीं, बल्कि माँगने की शैली में है। अंतरतम से माँगना वास्तव में माँगना नहीं होता; वह एक गहरी स्पष्टता होती है—जहाँ इच्छा, दिशा और कर्म एक रेखा में आ जाते हैं। पर जब मन कल्पना को ही अंतरतम घोषित कर देता है, तब वह भ्रम पैदा करता है। वह कहता है—“अनुभव करो कि तुम धनवान हो”—ताकि वास्तविक असंतोष, असुरक्षा और आलस्य को ढका जा सके।
इस दृष्टि से देखें तो कल्पना सबसे सस्ता निवेश इसलिए है क्योंकि उसमें कुछ दाँव पर नहीं लगता। न समय, न ऊर्जा, न पहचान। सब कुछ भीतर ही भीतर घट जाता है—या यूँ कहें, घटता हुआ मान लिया जाता है। यही कारण है कि कल्पना जल्दी बिकती है, लोकप्रिय होती है, और आध्यात्मिक भाषा में लिपटकर गहन प्रतीत होती है।
पर वास्तविक परिवर्तन सस्ता नहीं होता। वह कल्पना से नहीं, स्पष्टता से आता है। और स्पष्टता तब आती है जब मन यह स्वीकार करे कि केवल “महसूस कर लेने” से कुछ नहीं बदलता, जब तक कि उस अनुभूति के अनुरूप जीवन में गति, अनुशासन और जिम्मेदारी न उतरे।
कल्पना में सब संभव है—इसीलिए वह मन को प्रिय है। पर जीवन में जो संभव है, वही साधना माँगता है।
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