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मन सृजनशील है कि नहीं !

1 month ago By Yogi Anoop

मन सृजनशील है कि नहीं ! शब्द से निःशब्दता की यात्रा — माला-जाप का वास्तविक रहस्य

मन अत्यंत सृजनशील है। वह हर साधन को अपने पक्ष में तर्क के रूप में प्रस्तुत कर देता है। खाली बैठे हो तो वह कहता है—कुछ नहीं तो माला का ही जाप कर लो। फिर वह रुद्राक्ष का महत्व समझाता है, उँगलियों के एक्यूप्रेशर बिंदुओं का लाभ बताता है, रक्तचाप और तनाव में कमी की चर्चा करता है। यदि भौतिक समृद्धि चाहिए तो ‘श्रीम’ का जाप सुझाता है। मन के पास हर स्तर के लिए एक कथा है—स्वास्थ्य के लिए एक तर्क, धन के लिए एक तर्क, शांति के लिए एक तर्क। परंतु प्रश्न यह है कि क्या माला-जाप का उद्देश्य केवल इतना ही है?

मेरे अनुभव में माला-जाप की आंतरिक संरचना कहीं अधिक गहरी है। माला का प्रत्येक मनका एक शब्द का प्रतीक है—एक ध्वनि, एक उच्चारण, एक कंपन। परंतु उतना ही महत्वपूर्ण वह सूक्ष्म रिक्त स्थान भी है जो एक मनके के बाद आता है। यदि माला में 108 मनके हैं, तो 108 शब्दों के साथ 108 सूक्ष्म विराम भी हैं। पर हम अपनी चेतना को केवल शब्द पर टिकाए रखते हैं; विराम को नहीं देखते। हम ध्वनि को पकड़ते हैं, शून्यता को नहीं।

यही साधना का मूल बिंदु है। जब साधक एक मनका आगे बढ़ाता है, तो वह केवल शब्द की पुनरावृत्ति नहीं कर रहा होता; वह अनजाने में एक सूक्ष्म रुकावट का भी स्पर्श कर रहा होता है। उस रुकावट में, उस सूक्ष्म निःशब्दता में, मन की गति क्षणभर के लिए थमती और रुकती है। यदि साधक सजग हो, तो वही क्षण ध्यान का द्वार बन सकता है। परंतु सामान्यतः ऐसा नहीं होता। हम शब्दों को गिनते रहते हैं, पर उनके बीच के मौन को नहीं सुनते।

वास्तविक यात्रा शब्द से शब्द तक की नहीं है; शब्द से निःशब्दता की ओर है। चूँकि शब्द मन का व्यापार है इसलिए एक ही शब्द की पुनरावृत्ति करते हुए मन को निःशब्दतता के अनुभव की आदत भी बनानी पड़नी चाहिए । शब्द की पुनरावृत्ति अंततः हमें उस बिंदु तक ले जाने के लिए है जहाँ शब्द स्वयं अप्रासंगिक हो जाए। क्योंकि सत्य शब्द में नहीं, शब्द के पहले और बाद की रिक्तता में निहित है। वही रिक्तता स्थिरता का आधार है। वही शून्यता मन को उसकी अपनी चंचलता से मुक्त करती है।

यदि यह बोध न हो, तो परिणाम यह होता है कि शब्दों के ऊपर शब्दों के पर्वत खड़े हो जाते हैं। शब्दों में भाव और भावों में और भाव , अंततः भवसागर (भावनाओं) में घूमना । अंततः यह तो सिद्ध है कि मंत्र में शब्दों की पुनरावृत्ति मन का ध्येय नहीं हो सकता है । मन का ध्येय शब्दों के बाद होने वाली उस शून्यता से ही है जो एक मनके के बाद आता है । 

मेरे अनुसार यदि शब्दों की पुनरावृत्ति ही लक्ष्य होता तो मंत्रों का संचय बढ़ता है, साथ साथ मन का भार भी बढ़ता है। फिर साधना भी एक मानसिक गतिविधि बन जाती है—लाभ-हानि की गणना, फल की अपेक्षा, और कल्पनाओं का विस्तार। यह सब मन के ही खेल हैं। माला तब भी चल रही होती है, पर भीतर मौन का स्पर्श नहीं होता।

मैं उसी मन को सच्चे अर्थ में ज्ञानवान मानता हूँ जो शब्दों के बाद उस शून्यता की अनुभूति करने पर जोड़ देता है , उसके लिए उपाय खोजता है न कि शब्दों से और शब्द की उत्पत्ति । जो शब्द का उपयोग शब्द को पार करने के लिए करता है वही मन, अमन में स्थित हो सकता है । यही मन की वास्तविक सृजनशीलता है। क्योंकि सृजन का मूल स्रोत शून्य ही है—जहाँ कुछ नहीं, वहीं से सब कुछ उत्पन्न होता है। माला-जाप का रहस्य भी इसी सूक्ष्म परिवर्तन में छिपा है: शब्द से मौन की ओर, ध्वनि से शांति की ओर, और मन से शून्यता की ओर।

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