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मन को रोक लेना ही एकाग्रता है?

3 weeks ago By Yogi Anoop

प्रश्न: क्या केवल मन को रोक लेना ही एकाग्रता है?

उत्तर: नहीं। मन को रोक लेना एक कौशल हो सकता है, लेकिन स्वस्थ एकाग्रता तब होती है जब मन, मस्तिष्क, इंद्रियाँ और श्वास एक-दूसरे के साथ संतुलन में हों। वे क्षतिग्रस्त न हों ।  साधन और साध्य अलग अलग अवश्य हैं किंतु आदर साधन की भी करनी होगी, वह इसलिए कि वही तुम्हारे नियंत्रण में है , साध्य नहीं है । साधन (मन और इन्द्रिय तुम्हारे हाथ में है) जो नियंत्रण में है उसी के माध्यम से साध्य जो प्राप्य नहीं है उसे प्राप्त करने का प्रयत्न किया जाता है । यही तो एकाग्रता का लक्ष्य है । साधन का उपयोग जितना अच्छा होगा साध्य की प्राप्ति में सुलभता होगी । और इसके लिए साधन को शक्तिशाली बनाना होगा । इसी प्रक्रिया में योग ध्यान का महत्व बहुत अधिक बढ़ जाता है । 

अक्सर हम मान लेते हैं कि जो व्यक्ति देर तक एक जगह बैठकर, बिना हिले-डुले, मन को किसी एक बिंदु पर टिकाए रख सकता है, वही सबसे अधिक एकाग्र है। परीक्षा हॉल में, ध्यान की कक्षा में, या किसी कठिन काम के बीच—हम एकाग्रता को इसी रूप में पहचानते हैं: मन का रुक जाना, भटकाव का थम जाना।


पर क्या यही एकाग्रता की पूरी परिभाषा है?


नहीं ऐसा बिल्कुल भी नहीं है । रोकना एक कौशल है, अभ्यास से यह आ भी सकता है किंतु कौशल और स्वास्थ्य एक बात नहीं। एक व्यक्ति ज़बरदस्ती अपनी साँस रोक सकता है, अपनी मांसपेशियों को कस सकता है, अपने विचारों को दबा सकता है—और कुछ देर के लिए यह "एकाग्रता" जैसा दिख भी सकता है। पर इसके पीछे यदि दबाव और तनाव है, तो यह टिकाऊ नहीं होगा, और शरीर-मन पर इसका मूल्य चुकाना पड़ेगा। स्वस्थ एकाग्रता इससे भिन्न है। वह तब घटित होती है जब मन, मस्तिष्क, इंद्रियाँ और श्वास—ये चारों आपस में संतुलन में हों। कोई भी एक-दूसरे पर हावी होकर दूसरे को क्षति न पहुँचाए। यह जबरन थोपा गया ठहराव नहीं, बल्कि एक सहज तालमेल है।


साधन का आदर—क्योंकि वही हाथ में है


यहाँ एक सूक्ष्म पर महत्वपूर्ण भेद समझना ज़रूरी है: साधन और साध्य के बीच का भेद। साध्य है वह लक्ष्य जिसे हम पाना चाहते हैं—चाहे वह कोई परीक्षा का परिणाम हो, कोई आध्यात्मिक अनुभव हो, या जीवन की कोई और उपलब्धि। साधन है वह मार्ग, वह प्रक्रिया, जिससे होकर हम उस लक्ष्य तक पहुँचते हैं—यहाँ, मन और इंद्रियों और देह की साधना। 


ये दोनों अलग-अलग हैं, इसमें कोई संदेह नहीं। पर साधन का आदर करना क्यों ज़रूरी है? इसलिए नहीं कि साधन साध्य से बड़ा है, बल्कि इसलिए कि साधन ही हमारे नियंत्रण में है। मन और इंद्रियाँ हमारे हाथ में हैं—हम उन्हें प्रशिक्षित कर सकते हैं, उनकी देखभाल कर सकते हैं। पर उनके द्वारा जो परिणाम मिलेगा, वह हमारे हाथ में नहीं है।


यह बात हमें एक व्यावहारिक सत्य की ओर ले जाती है: जिस चीज़ पर हमारा नियंत्रण नहीं, उसकी चिंता में उलझने से बेहतर है कि जिस चीज़ पर नियंत्रण है, उसे सँवारा जाए। और साधन जितना अच्छा, स्वस्थ, और संतुलित होगा, साध्य की प्राप्ति उतनी ही सहज और सुखद होगी। नहीं भी हुई तो मन पुनः अपने साधन को मजबूत करने पर लग जाएगा । 


दबाव नहीं:  इसीलिए बच्चों को या किसी को भी "एकाग्र होने" के नाम पर मन पर दबाव डालने की सलाह देना खतरनाक हो सकता है। जब हम कहते हैं "ध्यान लगाओ", "मन मत भटकाओ", और इसके पीछे कोई डर , दंड या किसी लालच का भाव हो, तो हम मन को रोकने की कोशिश तो करवा रहे होते हैं, पर संतुलन नहीं सिखा रहे होते। परिणाम अल्पकालिक लाभ और दीर्घकालिक क्षति के रूप में सामने आ सकता है। असली एकाग्रता बल से नहीं, संतुलन से आती है। और संतुलन समझदारी से और समझदारी में कितना धैर्य होगा आप समझ सकते हैं   ।  इसी को बेहतर करने के लिए योग ध्यान के विज्ञान में कई विधियों का प्रयोग किया जाता है । इसी प्रक्रिया में सांसों की सहजता, इंद्रियों को उत्तेजना से मुक्त करने , मस्तिष्क शांत करने पर जोड़ दिया जाता है । इसीलिए एकाग्रता के अभ्यास में रुचि का महत्व बहुत अधिक होता है । रुचिकर विषय पर मन की एकाग्रता में बहुत अधिक सुलभता दिखती है , इसमें इन्द्रियों और मस्तिष्क के सूक्ष्म अंगों पर तनाव कम से कम पड़ता अहि और इन सभी साधनों को बहुत शीघ्रता से अभ्यस्त करवाने में बहुत आसानी हो जाती है ।  और यदि मन को किसी विषय में स्वाभाविक रुचि न हो—तब एकाग्रता करने व करवाने में मन और इन्द्रियों को असहजता होती है । 

मैं इसीलिए एकाग्रता को सहज रूप में ही देखता हूँ । यहाँ तक कि योग में भी बहुत सारे साधकों की कुछ उम्र के बाद बहुत अधिक रोग दिखायी देते हैं , जब कि उनके ख़ान पान रहन सहन में किसी भी प्रकार के दोष नहीं दिखायी देत हैं । किंतु फिर भी रोग क्यों ! वे इसे पूर्ण जन्म के कर्म मन सकते अहीन किंतु मेरे अपने अनुभव में ये सब इसी जन्म में अज्ञानतावश किए गए एकाग्रता पूर्वक कर्म ही है ।

मैं स्वयं इन असावधानियों का भुक्तभोगी रहा हूँ । साधना काल के दौरान आप असावधानीवश बहुत सारी ग़लतियाँ करते हैं , जिसमें धैर्य टूटने लगता , बहुत उत्तेजना से साधना करते अहीन , जल्दीबाज़ी में साधना करते हैं इत्यादि ऐसी ऐसी साधनाओं में ग़लतियाँ हो जाती हैं जिससे शरीर रोगी होकर कष्ट देता है । 

वास्तविकता यह है कि इसी से गुरु अपने अनुभवों को बताकर शिष्य को बचाता है । उसे एकाग्रता की कैसी कर्णिक चाहिए और कसी नहीं । 


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