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मैं इस संसार में क्यों आया?

4 days ago By Yogi Anoop

मैं इस संसार में क्यों आया?

मनुष्य के मन में शायद सबसे पुराना और सबसे गहरा प्रश्न यही रहा है—मैं इस संसार में क्यों आया हूँ? मेरा जन्म मनुष्य के रूप में ही क्यों हुआ? मैं किसी अन्य जीव या जानवर के रूप में क्यों नहीं जन्मा?

इन प्रश्नों के सामने जब मैं स्वयं को पूरी ईमानदारी से खड़ा करता हूँ, तो मुझे स्वीकार करना पड़ता है कि इसका उत्तर मुझे ज्ञात नहीं है। मैं इस संसार में क्यों आया हूँ—यह मैं नहीं जानता। यदि मैं इसके संबंध में कोई निश्चित उत्तर देने का प्रयास करूँ, तो संभव है कि वह मेरे मन द्वारा निर्मित एक कल्पना मात्र हो।

इसी प्रकार, यदि कोई मुझसे पूछे कि मैं जानवर क्यों नहीं हुआ, तो मेरे पास एक बहुत सीधा-सा उत्तर है—मैं मनुष्य से उत्पन्न हुआ हूँ, इसलिए मनुष्य हूँ; जानवर से जो उत्पन्न होता है, वह जानवर होता है। इससे अधिक निश्चित उत्तर मेरे पास नहीं है। यदि मैं इसके अतिरिक्त कोई और उत्तर गढ़ने का प्रयास करूँ—कर्मों, पूर्वजन्मों, नियति या किसी अदृश्य योजना के आधार पर—तो वह मेरे प्रत्यक्ष अनुभव से अधिक मेरी कल्पना का विस्तार होगा।

मेरे अनुभव में एक बात स्पष्ट है कि जो आप हैं और जहाँ आप हैं, उसे आप किसी न किसी सीमा तक जानते हैं। हो सकता है आपका ज्ञान सीमित हो, अधूरा हो, किंतु कम से कम आप उसी के बारे में बोल रहे होते हैं जिसका किसी रूप में आपको अनुभव है।

उदाहरण के लिए, यदि कोई कहता है—“मैं यह देह हूँ”, तो मैं उसकी इस बात को भी एक स्तर पर सत्य मानता हूँ। एक छोटा बच्चा भी स्वयं को अपने शरीर के माध्यम से ही जानता है। वह जो अनुभव कर रहा है, वही कह रहा है। उसके कथन में भले ही दार्शनिक गहराई न हो, किंतु उसमें अनुभव की ईमानदारी अवश्य है। किंतु मैं उसे नहीं स्वीकार कर सकता जब कोई यह कहे कि मैं आसमान हूँ , कोई यह कहें कि मैं जल हूँ , कोई यह कहे कि मैं पूरा ब्रह्मानंद हूँ ! वह इसलिए कि यह कहने में उसकी कल्पना पूरी तरह से झलकती है । और मैं किसी भी काल्पनिक सत्य को सत्य न मानते हुए बहुत बुरा असत्य मानता हूँ । 

मेरे लिए वह व्यक्ति अधिक सत्यवादी है जो अपनी सीमित अनुभूति को स्वीकार करता है, बजाय उस व्यक्ति के जो कल्पनाओं की विशाल दुनिया में व्यस्त होकर ऐसी बातों को निश्चित रूप से कहता फिरता है जिनका उसे स्वयं प्रत्यक्ष अनुभव नहीं है—विशेषकर पूर्वजन्म, भविष्य या मृत्यु के बाद की अवस्थाओं के संबंध में।

इसीलिए जब मैं स्वयं से पूछता हूँ—मृत्यु के बाद मैं कहाँ जाऊँगा?—तो मेरा उत्तर है: मुझे ज्ञात नहीं।

मुझे केवल इतना ज्ञात है कि मैं अभी हूँ। मुझे इस वर्तमान क्षण का अनुभव है। मुझे स्वयं के होने की अनुभूति है। इसके अतिरिक्त जो कुछ भी मैं निश्चित रूप से कहने का प्रयास करूँगा, वह संभवतः मेरे अनुभव से नहीं, बल्कि मेरी कल्पना से प्रेरित होगा।

सच तो यह है कि इसी वर्तमान क्षण में केवल एक बात प्रत्यक्ष रूप से अनुभव की जा सकती है—“मैं हूँ।”

यह “मैं हूँ” किसी विचार का परिणाम नहीं है। विचार आने से पहले भी होने का अनुभव है। विचार हो अथवा न हो “मैं” के होने का बोध तो सब को होता ही है , यहाँ तक कि जानवरों को होता है , तभी तो वे शिकारियों से स्वयं का बचाव करते हैं । संसार के बारे में अनेक कल्पनाएँ की जा सकती हैं, जन्म के कारणों के बारे में अनेक सिद्धांत बनाए जा सकते हैं और मृत्यु के बाद की यात्राओं के बारे में अनगिनत धारणाएँ निर्मित की जा सकती हैं। किंतु इन सबके पीछे, इस क्षण में, एक सीधी अनुभूति उपस्थित है—मैं हूँ। ये सभी कल्पनाएं असत्य हो सकती हैं किंतु जहाँ से कल्पनाओं का जन्म हो रहा है वे असत्य नहीं हो सकती अहीन क्योंकि वे ही तो कल्पक है । 

मेरे लिए यही सबसे निकट का सत्य है। इसके आगे क्या था, क्यों था, पहले क्या हुआ और बाद में क्या होगा—इन सबके संबंध में मन अनंत कल्पनाएँ कर सकता है। हो सकता है वे कल्पनाएँ सुंदर हों, सांत्वना देने वाली हों या किसी कहानी का आधार हों, किंतु जब तक वे प्रत्यक्ष अनुभव न बन जाएँ, तब तक उन्हें सत्य से अधिक कल्पना के रूप में स्वीकार करना ही मेरे लिए ईमानदारी है। 

इसलिए मैं केवल इतना कह सकता हूँ—इस समय मैं हूँ, और मेरे लिए अभी इतना ही ज्ञात है। शेष सब शायद मन का फेरा है— कल्पना का फेरा।


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