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क्या यूनिवर्स फीलिंग्स सुनता है?

2 weeks ago By Yogi Anoop

क्या यूनिवर्स हमारी भावनाओं को सुनता है?

आजकल एक विचार बहुत प्रचलित है— “यूनिवर्स आपकी भाषा नहीं सुनता, क्योंकि उसकी कोई भाषा नहीं होती। वह आपकी फीलिंग्स को सुनता है। आप जो महसूस करते हैं, यूनिवर्स वही आपको देना शुरू कर देता है।” सुनने में यह विचार आकर्षक लगता है। इसमें आशा है, कल्पना है और व्यक्ति को यह विश्वास भी मिलता है कि उसकी आंतरिक भावनाएँ किसी विशाल ब्रह्मांडीय शक्ति से जुड़ी हुई हैं।

लेकिन प्रश्न यह है कि—हमें यह कैसे ज्ञात हुआ कि यूनिवर्स हमारी भाषा नहीं सुनता, लेकिन हमारी भावनाओं को सुनता है?और यदि यूनिवर्स हमारी भावनाओं को सुनता है, तो वह उन्हें सुनता कैसे है?

भावना सुनने के लिए क्या क्या आवश्यक होता है?


मनुष्य के भीतर किसी ध्वनि, स्पर्श, दृश्य या अनुभव को ग्रहण करने के लिए एक जटिल जैविक तंत्र मौजूद है। हमारे पास इन्द्रियाँ हैं, तंत्रिका तंत्र है, मस्तिष्क है और अनुभव को सुख-दुःख, भय-आनंद अथवा अन्य भावनाओं में परिवर्तित करने की क्षमता है।

Feeling स्वयं कोई स्वतंत्र वस्तु नहीं है जो शरीर से निकलकर अंतरिक्ष में घूमती हो।

भावना हमारे शरीर और मस्तिष्क में चलने वाली अनेक प्रक्रियाओं का परिणाम है। किसी घटना को हम देखते हैं, सुनते हैं, स्पर्श करते हैं या उसके बारे में सोचते हैं; मस्तिष्क उसका अर्थ बनाता है और उसके परिणामस्वरूप एक भावनात्मक अनुभव उत्पन्न होता है। इसलिए जब कोई कहता है कि यूनिवर्स आपकी फीलिंग्स सुनता है, तो स्वाभाविक प्रश्न उठता है—

सुनने वाला कौन है? 
अनुभव करने वाला कौन है? 


और भावना को ग्रहण करने वाला तंत्र कहाँ है?

यदि कोई व्यक्ति जंगल या किसी पहाड़ पर खड़ा होकर जोर से चिल्लाए, तो उसकी ध्वनि एक भौतिक तरंग के रूप में वातावरण में फैल सकती है। ध्वनि को सुनने के लिए कान जैसे किसी ग्रहण करने वाले तंत्र की आवश्यकता होती है। किंतु यदि वही व्यक्ति वहाँ खड़ा होकर केवल कोई तीव्र भावना अनुभव करे, तो यह मान लेने का आधार क्या है कि पूरा ब्रह्मांड उस भावना को उसी प्रकार अनुभव कर रहा है? उसके लिए भी एक तंत्र की आवश्यकता होती है । 

यह प्रश्न आध्यात्मिकता के विरोध का नहीं, बल्कि अनुभव और कल्पना के बीच अंतर करने का प्रश्न है। पहले अपने भीतर के यूनिवर्स की भाषा सुनिए । एक विचित्र स्थिति तब उत्पन्न होती है जब व्यक्ति पूरे ब्रह्मांड की भाषा समझने की बात करता है, लेकिन अपने शरीर की मौन भाषा तक नहीं समझता।

हमारा पेट बोलता नहीं है, फिर भी वह अपनी स्थिति प्रकट करता है। वह अपनी भूख बताता है किंतु किसी भाषा के माध्यम से नहीं , कितनी मात्र में खाना है वह भी बताता है किसी भाषा में नहीं बोलता ।  अर्थात् पेट के पास कोई मानव भाषा नहीं है, किंतु शरीर के भीतर संकेतों की एक जटिल व्यवस्था है। तंत्रिका तंत्र, हार्मोन, रासायनिक संकेत और मस्तिष्क के बीच निरंतर संवाद चलता रहता है।


यदि कोई व्यक्ति अपने शरीर के इन प्रत्यक्ष संकेतों को समझने का प्रयास करके, यह दावा करता है कि वह ब्रह्मांड की भाषा और उसकी भावनाओं को समझता है, तो यह विचार कुछ विचित्र अवश्य लगता है। शायद हमें पहले इस देह-रूपी यूनिवर्स को समझने का प्रयास करना चाहिए। यह शरीर भी अपने आप में एक विशाल ब्रह्मांड है। जिसमें असंख्य कोशिकाएँ, तंत्रिकाएँ, रासायनिक प्रक्रियाएँ, संवेदनाएँ और अनुभव विद्यमान है । और वे सब निरंतर कार्य कर रहे हैं। बाहर के अनंत ब्रह्मांड को अपनी भावनाएँ भेजने से पहले यदि व्यक्ति अपने भीतर चल रहे इस ब्रह्मांड को सुनना सीख ले, समझना सीख लेंगे तो संभवतः उसका अनुभव अधिक वास्तविक और गहरा हो सकता है।


ध्यान रहे भावना परिणाम है, कारण नहीं । यहाँ एक और महत्वपूर्ण बात समझने योग्य है—Feeling सामान्यतः किसी अनुभव, विचार या घटना के बाद उत्पन्न होने वाली प्रतिक्रिया है। हम किसी वस्तु को देखते हैं और आनंद अनुभव करते हैं। कोई अप्रिय घटना होती है और दुःख उत्पन्न होता है। कोई स्मृति आती है और भय या सुख की भावना पैदा होती है। अर्थात् भावना अक्सर किसी अनुभव, संवेदना, स्मृति या विचार की प्रक्रिया का परिणाम होती है।

किंतु भावना प्रधान व्यक्ति ज्यादातर वास्तविक अनुभव के बिना ही किसी विशेष भावना को उत्पन्न करने का प्रयास करता है। ऐसा इसलिए होता है क्योंकि वह भावनाओं का भूखा होता है । वह कल्पना करता है कि उसे बहुत धन मिल गया है, वह अत्यंत सफल हो गया है, कोई विशेष वस्तु प्राप्त हो गई है—और फिर उन कल्पनाओं के आधार पर वैसी ही भावना पैदा करने का प्रयास करता है। उसे यह लगता है कि यूनिवर्स उसकी इन भावनाओं को सुनकर प्रदान कर देगा तो इस महाभ्रम को त्याग देना चाहिए । यदि अपने मन मस्तिष्क और देह को भयंकर रोगी होने से बचाना है तो । यह सत्य है कि कुछ समय व वर्षों के लिए यह सुखद लगे किंतु जब व्यक्ति निरंतर वास्तविकता से हटकर केवल काल्पनिक परिस्थितियों के माध्यम से भावनाओं का निर्माण करने लगता है, तो मनुष्य धीरे-धीरे अनुभव की जगह कल्पना में जीने लगता है। यहीं से दिवास्वप्न और वास्तविक जीवन के बीच दूरी बढ़ने लगती है।


कल्पना उपयोगी है, लेकिन वास्तविकता का स्थान नहीं ले सकती, कल्पना मनुष्य की एक अद्भुत क्षमता है किंतु वास्तविक अनुभव उन सारी कल्पनाओं को ध्वस्त कर देती है । इसीलिए वास्तविक अनुभव मन को गहरा बना देती है, उसे इधर उधर भटकने से रोक देती है, सभी शंकाओं से मुक्त कर देती है ।  मैं यह स्वीकार करता हूँ कि भविष्य की योजना बनाने के लिए भी कल्पना आवश्यक है किंतु कल्पना और अनुभव एक ही चीज़ नहीं हैं। उसे अनुभव का स्रोत मत समझो, क्षण भर के लिए साधन बना सकते हो किंतु उसे मूल सत्य नहीं समझना चाहिए ।  उसे उसे वास्तविक अनुभव करने का साधन अवश्य बना सकते हो । किंतु वही सत्य है यह मन मस्तिष्क के लिए सबसे अधिक हानिकारक है । इसलिए मैं कहता हूँ कि कल्पना हमें किसी संभावना तक ले जा सकती है, लेकिन उसे वास्तविकता मान लेना मानसिक भ्रम पैदा कर देगा ।


यदि मनुष्य निरंतर अपनी इच्छाओं की काल्पनिक दुनिया बनाकर उन्हीं से भावनात्मक सुख प्राप्त करने का प्रयास करता रहे, तो उसका मस्तिष्क वास्तविक जीवन की तुलना में कल्पना की दुनिया में अधिक सक्रिय रहने लगता है। ऐसी स्थिति में मन को विश्राम देने के बजाय व्यक्ति लगातार विचारों और भावनात्मक दृश्यों का निर्माण करता रहता है। धीरे-धीरे यह मानसिक थकान, बेचैनी और वास्तविकता से असंतोष का कारण बन जाता है। इसलिए प्रश्न यह नहीं है कि कल्पना करनी चाहिए या नहीं। प्रश्न यह है कि—क्या हम कल्पना को एक साधन की तरह उपयोग कर रहे हैं, या धीरे-धीरे कल्पना को ही अपना अनुभव मान बैठे हैं?


प्रत्यक्ष अनुभव और काल्पनिक अनुभव

मनुष्य के लिए सबसे विश्वसनीय आधार उसका प्रत्यक्ष अनुभव है। जो हम देखते हैं, सुनते हैं, स्पर्श करते हैं और शरीर तथा मन के माध्यम से अनुभव करते हैं—उसकी जाँच और अवलोकन किया जा सकता है। इसका अर्थ यह नहीं कि जो अभी प्रत्यक्ष नहीं है, वह अस्तित्वहीन है। ब्रह्मांड में ऐसी अनेक वस्तुएँ और घटनाएँ हैं जिन्हें हम प्रत्यक्ष इन्द्रियों से नहीं देख सकते, लेकिन वैज्ञानिक उपकरणों और परीक्षणों के माध्यम से उनके प्रभावों का अध्ययन किया जा सकता है।

इसलिए अधिक उचित बात शायद यह होगी—जिसका प्रत्यक्ष अनुभव नहीं है, उसके प्रति कल्पना की जा सकती है; लेकिन कल्पना को अनुभव मान लेना उचित नहीं है। ब्रह्मांड के बारे में विस्मय होना सुंदर है। उसकी विशालता के सामने मौन होना भी एक अनुभव है। लेकिन यह कहना कि यूनिवर्स मेरी हर भावना सुन रहा है और उसी के अनुसार मुझे वस्तुएँ भेज रहा है—यह एक भावनात्मक विश्वास हो मात्र है, किंतु इसे बिना प्रमाण के आध्यात्मिक सत्य कहना उचित नहीं होगा।


वास्तविक आध्यात्मिकता बाहर नहीं, भीतर से आरंभ होती है शायद समस्या ब्रह्मांड के बारे में सोचने में नहीं है। समस्या तब शुरू होती है जब व्यक्ति अपने सामने उपस्थित जीवन को छोड़कर केवल कल्पना के अनंत ब्रह्मांड में जीने लगता है। आपका शरीर इस समय क्या कह रहा है? आपकी साँस कैसी चल रही है? आपके पेट की स्थिति क्या है? आपका मन शांत है या लगातार कल्पनाओं का निर्माण कर रहा है? आपकी इन्द्रियाँ वास्तव में क्या अनुभव कर रही हैं? इन प्रश्नों को देखना संभवतः उस काल्पनिक संवाद से अधिक वास्तविक है जिसमें व्यक्ति अनंत ब्रह्मांड को संदेश भेजने की कोशिश कर रहा है।

पहले इस देह-रूपी यूनिवर्स को समझिए। क्योंकि जो व्यक्ति अपने भीतर उत्पन्न होने वाली वास्तविक संवेदनाओं, विचारों और भावनाओं को स्पष्ट रूप से नहीं देख पाता, वह बाहर के अनंत ब्रह्मांड के बारे में अपनी कल्पनाओं को भी आसानी से वास्तविक अनुभव समझ सकता है। वास्तविक अनुभव वहीं से आरंभ होता है जहाँ हम कल्पना और सत्य के बीच अंतर करना सीखते हैं। 

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