जी हाँ, यह संबंध बिल्कुल संभव है—किंतु इसे सीधे-सीधे “डकार → सांस फूलना” के रूप में समझना थोड़ा अधूरा होगा। वास्तविक संबंध थोड़ा गहरा और परतदार है।
डकार का बार-बार आना या रुक जाना, दोनों ही इस बात के संकेत हैं कि आमाशय, पेट और डायाफ्राम के बीच संतुलन ठीक नहीं है। जब वायु का निर्माण और दबाव आमाशय में आवश्यकता से अधिक हो जाता है, तो वायु की उल्टियाँ होना प्रारम्भ हो जाती हैं। कुछ ऐसा ही जैसे आमाशय में भोजन का आवश्यकता से अधिक दबाव हो जाए और उसका छोटी आंतों की तरफ़ जाना रुक जाए, तो स्वाभाविक रूप से भोजन ऊपर की ओर आना शुरू हो जाता है, जिसे उल्टी कहते हैं। इसी प्रकार मैं डकार को वायु की उल्टी कहता हूँ। चूँकि आमाशय में बनने वाली वायु का आंतों की तरफ़ जाना संभव नहीं होता है, इसीलिए कि वह क्षेत्र भोजन जाने के लिए है, न कि वायु के लिए। जो भी पाचन (पृथ्वी तत्व) से संबंधित वस्तुएँ, चाहे वह पत्थर ही क्यों न हों, वही नीचे की ओर गमन कर सकती हैं। अर्थात् आमाशय में निर्मित वायु का नीचे की ओर गमन संभव नहीं है। यद्यपि यौगिक क्रियाओं से यह संभव है, किंतु वह सामान्य जन के लिए नहीं है।
अब ध्यान देने योग्य यह है कि जब आमाशय में निर्मित वायु का दबाव बढ़ता है, तब डायाफ्राम में दबाव और हलचल होना शुरू हो जाता है। इसी को कहते हैं छाती में दबाव और तनाव। चूँकि आमाशय पेट के ऊपरी बाएँ हिस्से में होता है, तो उसी तरफ़ की छाती में भी दबाव का होना स्वाभाविक हो जाता है। हलचल की इसी मात्रा में भोजन नली में भी वायु का दबाव बढ़ जाता है। अब गले में भी दबाव बढ़ जाता है।
यहीं से सांसों और संतुलन से संबंधित समस्याएँ शुरू होने लगती हैं। थोड़े-थोड़े चक्कर जैसे भी आने लगते हैं। यदि शरीर अपने स्वभाव में उस दबाव वाली वायु को अंदर से निकालने में कामयाब हो जाता है, तब उसे ही डकार कहते हैं। यदि शरीर और मन उसे निकालने में कामयाब नहीं हो पाते हैं, तब वह समस्या के रूप में पनपने लगता है।
मेरे अनुभव में यह पेट, डायाफ्राम और भोजन नली के मध्य लय को इतना खराब कर देता है कि साँसों से संबंधित समस्याएँ दिखने लगती हैं। वैज्ञानिक दृष्टि से देखें तो डायाफ्राम श्वास की मुख्य मांसपेशी है। जब यह नीचे की ओर सहजता से नहीं जा पाता—चाहे वायु (गैस) के दबाव के कारण, या पहले से मौजूद मांसपेशीय जकड़न के कारण—तो फेफड़ों का विस्तार अधूरा रह जाता है। इसका परिणाम यह होता है कि श्वास सतही (shallow) हो जाती है, जबकि फेफड़ों में स्वयं कोई समस्या नहीं होती। यह समस्या तो केवल ऊपर जाने वाली वायु के दबाव के कारण होती है।
ऐसी स्थिति में, जैसे ही शरीर को थोड़ी अधिक ऑक्सीजन की आवश्यकता होती है (चलना, सीढ़ियाँ चढ़ना, या कभी-कभी केवल बात करना भी), व्यक्ति को महसूस होता है कि “साँस कम पड़ रही है” या सांस फूल रही है।
मेरे दार्शनिक दृष्टिकोण से यहाँ डकार और सांस फूलना—दोनों एक ही मूल असंतुलन के अलग-अलग संकेत हैं। एक तरफ शरीर वायु के माध्यम से दबाव को बाहर निकालने की कोशिश कर रहा होता है (डकार), और दूसरी तरफ वही क्षेत्र श्वास को पूरी तरह खुलने नहीं दे रहा होता है (सांस फूलना)।
इसलिए उत्तर यह है: जी हाँ, बार-बार डकार आना या उसका असामान्य होना, सांस फूलने के अनुभव से जुड़ा हो सकता है—किंतु इसे फेफड़ों की समस्या नहीं कहा जा सकता। इसका कारण फेफड़े नहीं, बल्कि डायाफ्राम और पेट के क्षेत्र में बना हुआ आंतरिक दबाव और जकड़न है। और उस जकड़न तथा दबाव का मूल कारण मन की रेस्टलेसनेस ही है। बिना इसे समझे समस्या का मूल समाधान नहीं निकाला जा सकता।
इसीलिए मैं इस उदान वायु को पेट व डायाफ्राम की जकड़न न कहकर मन-मस्तिष्क की जकड़न कहता हूँ। क्योंकि खींचातानी करने वाला तो वही मन है; पेट में स्वयं अपना खिंचाव नहीं होता।
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