कुत्तों का गुरु (Doga Guru)
वे दिन मेरे लिए किसी आध्यात्मिक उपलब्धि के नहीं, बल्कि आत्म-विस्मय के थे। एक सुबह फ़ोन आया और मुझे यह ज्ञात हुआ कि मैं अब केवल योग और ध्यान का गुरु नहीं रहा—मैं डोगा गुरु भी बन चुका हूँ। यह जानकारी मुझे किसी दीक्षा, तप या साधना से नहीं मिली थी, बल्कि मोबाइल नेटवर्क के माध्यम से प्राप्त हुई थी।
इस नई उपाधि के साथ-साथ लोग अपने फ्रस्ट्रेटेड कुत्तों की समस्याएँ लेकर आने लगे। प्रश्न गंभीर थे—पर समाधान अपेक्षित था ऑर्गेनिक, यौगिक और ध्यानात्मक। मुझे पहली बार एहसास हुआ कि आधुनिक मनुष्य जब स्वयं को नहीं समझ पाता, तो वह कम से कम अपने कुत्ते को समझ लेने की आशा अवश्य करता है।
एक कॉल विशेष रूप से उल्लेखनीय थी। सामने से अत्यंत विनम्र स्वर में कहा गया—“आप बहुत महान कार्य कर रहे हैं।” इतना सुनते ही मेरे भीतर वे सभी रासायनिक प्रतिक्रियाएँ घटित होने लगीं, जिनसे किसी भी सामान्य गुरु का अहंकार पुष्ट हो सकता है।
मैंने औपचारिक विनम्रता निभाते हुए पूछा—“समस्या क्या है?”
उत्तर मिला—“मेरा कुत्ता आत्मसंयम खो चुका है। इसलिए मैं उसे गुरुग्राम के एक कुत्तों के होटल में डेटिंग के लिए ले जा रहा हूँ। वहाँ दिनभर फीमेल कुत्तों के साथ रहेगा, तो उसे आंतरिक शांति मिलेगी।”
क्षणभर के लिए मैं मौन में चला गया—न ध्यान में, न समाधि में, बल्कि असमंजस में। जीवन में पहली बार मुझे यह स्पष्ट हुआ कि ब्रह्मचर्य केवल मनुष्य के लिए ही नहीं, कुत्तों के लिए भी एक कठिन साधना है।
मैंने साहस जुटाकर कहा—“प्रिय, मैं कुत्तों का गुरु नहीं हूँ।”
पर श्रद्धा तर्क से अधिक शक्तिशाली होती है। उत्तर आया—“नहीं गुरुदेव, आप कुत्तों के महान गुरु हैं। मैंने आपको पत्रिका में पढ़ा है। आपने कई कुत्तों के मुँह से ‘ॐ’ निकलवा दिया है। आपने उनके काम और क्रोध को शांत किया है। यह पशु-जगत पर आपका उपकार है।”
मन ही मन मैंने सोचा—अब बस यही शेष है कि कोई यह पूछ ले कि क्या मैं कुत्तों को आत्मदर्शन भी करवा देता हूँ, या वह सेवा अगले जन्म के लिए सुरक्षित है।
बाह्य रूप से शांत रहते हुए मैंने केवल इतना कहा—“संभवतः आपको कोई गंभीर गलतफहमी हुई है। मेरे पास ऐसा कोई विशिष्ट ज्ञान नहीं है। और यह भी मेरे लिए उतना ही रहस्य है कि मैं कब, कैसे और क्यों ‘डोगा गुरु’ घोषित कर दिया गया।”
शायद यह युग का सत्य है—यहाँ ज्ञान कम, लेबल जल्दी मिलता है।
ज्ञान के लिए समय चाहिए, मौन चाहिए, साधना चाहिए; और लेबल के लिए केवल एक क्षणिक धारणा पर्याप्त होती है। लोग अनुभव को परखने की जगह शीर्षक को स्वीकार कर लेते हैं। यहाँ सत्य की जाँच नहीं होती, उसकी पैकेजिंग देखी जाती है। जो जितना कम समझाया गया हो, उतना ही अधिक मान लिया जाता है।
और गुरु बनने के लिए अब साधना नहीं, केवल एक गलत उद्धरण ही पर्याप्त है।
कोई वाक्य संदर्भ से काट लिया जाए, किसी विचार को आधा सुना जाए, और शेष कल्पना श्रद्धा पूरी कर देती है। न शिष्य को साधना चाहिए, न गुरु को अनुभूति—केवल एक छपी हुई पंक्ति, एक वायरल वाक्य, और एक सामूहिक गलतफहमी ही आज दीक्षा बन चुकी है।
इन सबके बावजूद मैं अपने अनुभूति में मौजूद हूँ , मैं हूँ ——-मैं हूँ
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