जिसे रोका जा सकता है उसे रोकना ही साधना है
यदि कोई यह प्रश्न पूछे कि “मैं ऐसा क्या करूँ कि मेरी कोई बुराई न करे?”—तो यह प्रश्न सुनने में जितना सरल है, उतना ही गहरा और दार्शनिक है। क्योंकि यह प्रश्न सीधे-सीधे मनुष्य की स्वतंत्रता, उसकी सीमाओं और उसकी साधना की वास्तविक दिशा से जुड़ा हुआ है।
मेरे पास ऐसी कोई साधना नहीं है कि मैं संसार के सभी लोगों के मन को नियंत्रित कर सकूँ। न ही यह संभव है कि कोई व्यक्ति ऐसा कर पाए। मैंने यदि कुछ किया है, तो वह केवल स्वयं पर किया है—और वह भी अपनी ऐक्षिक वृत्तियों पर। ऐक्षिक वृत्तियों का अर्थ है वे इच्छाएँ और विचार, जिन्हें मैंने स्वयं उत्पन्न किया है।
उदाहरण के लिए—मन में विचार आया कि कुछ चटर-पटर खाया जाए। खाली बैठे हैं, माहौल खुशनुमा है, तो समोसे, रसगुल्ले, आइसक्रीम खा ली जाए। मूवी देख ली जाए। ये सभी इच्छाएँ मेरे मन की उपज हैं। इन्हें मैं चाहूँ तो टाल सकता हूँ, बदल सकता हूँ, या सीमित कर सकता हूँ। क्योंकि इनका जन्म मेरे भीतर हुआ है, इसलिए इन पर मेरा अधिकार भी संभव है।
लेकिन अब दूसरी ओर उन वृत्तियों को देखिए, जो मैंने पैदा नहीं कीं। गला और जीभ सूख रही है—शरीर स्पष्ट संकेत दे रहा है कि पानी दो। पेट भूख का संकेत दे रहा है—खाना दो। भूख के कारण सिर दर्द हो रहा है, चिड़चिड़ापन आ रहा है, मूड स्विंग हो रहा है। छींक आने को है—तो क्या मैं उसे दार्शनिक तर्क से रोक सकता हूँ? क्या मैं कह सकता हूँ कि “मैं साधक हूँ, इसलिए मुझे छींक नहीं आएगी”? नहीं।
यहाँ एक अत्यंत सूक्ष्म किंतु निर्णायक अंतर है। ये वृत्तियाँ अनैक्षिक हैं—इन्हें मैंने नहीं चुना, इन्हें प्रकृति ने रचा है। शरीर का स्वभाव है कि वह भूख, प्यास, थकान, रोग, छींक, नींद जैसे संकेत देगा। इन्हें रोकने का प्रयास करना योग नहीं है; यह अज्ञानता है।
इसलिए जो लोग—चाहे वे स्वयं को योगी कहें, साधक कहें या आध्यात्मिक मान लें—यदि यह सोचते हैं कि वे इन अनैक्षिक वृत्तियों को समाप्त कर देंगे, तो वे साधना नहीं कर रहे, बल्कि वास्तविकता से पलायन कर रहे हैं। योग का उद्देश्य शरीर और प्रकृति के विरुद्ध युद्ध नहीं है।
यही कारण है कि योग, ध्यान और अध्यात्म की उत्पत्ति का मूल प्रयोजन कुछ और है। ये प्रणालियाँ हमें उन वृत्तियों को नियंत्रित करना सिखाती हैं, जो हमने भ्रमवश अपने स्वभाव का हिस्सा मान ली हैं, जबकि वे वास्तव में हमारी ही मानसिक रचनाएँ हैं। क्रोध, ईर्ष्या, तुलना, भय, अहंकार—ये जन्मजात नहीं हैं; ये सीखे हुए, निर्मित और पोषित किए गए स्वभाव हैं।
यह सिद्धांत स्पष्ट है कि जो स्वभावगत है, उसके स्वभाव को बदलना संभव नहीं। आग का स्वभाव जलाना है, पानी का बहना। उसी प्रकार शरीर का स्वभाव संकेत देना है। किंतु जिस स्वभाव को मैंने अज्ञान में अपना मान लिया है—जिसे मैंने वर्षों तक अभ्यास से गढ़ा है—उसे समाप्त करना न केवल संभव है, बल्कि यही वास्तविक साधना है।
अतः यदि कोई चाहता है कि उसकी बुराई न हो, तो उसका उपाय दूसरों को बदलना नहीं है। उपाय है—अपने भीतर उन ऐक्षिक वृत्तियों को देखना, समझना और शांत करना, जिनके कारण दूसरे को बोलने का अवसर मिलता है। जब भीतर की अनावश्यक प्रतिक्रियाएँ समाप्त होती हैं, तब बाहर की बुराई स्वतः अर्थहीन हो जाती है।
यही योग है। यही विवेक है। और यही साधना की प्रामाणिक दिशा।
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