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इंफ्लेमेशन : शारीरिक और मानसिक रूप

2 weeks ago By Yogi Anoop

इंफ्लेमेशन — शारीरिक और मानसिक रूप

किसी भी वस्तु को आवश्यकता से अधिक समय तक पकड़े रखना, होल्ड किए रखना — यही संग्रह तो इंफ्लेमेशन का जन्म है। उदाहरण के रूप में, यदि मुट्ठी में किसी वस्तु को पकड़कर दिन-रात पकड़े रहिए, तब क्या होगा?

वस्तु को शायद कोई गहरा नुकसान न हो। हो सकता है वह मलिन हो जाए, सड़ जाए या नष्ट हो जाए। उसके विनाश से मन को वेदना अवश्य होगी। उसके नष्ट हो जाने से शरीर पर अचानक गहरा आघात भी लग सकता है। किंतु जिस हाथ में पूरे दिन वह पकड़ी रही, उस हाथ को कितना तनाव सहना पड़ा होगा! उस हाथ में कितनी इंफ्लेमेशन और कितना दर्द हुआ होगा!  किंतु यह तो केवल हाथ की बात है। याद रखिए — हाथ ने उस वस्तु को स्वयं नहीं पकड़ा था; उसने उसे मन के निर्देश पर पकड़ा था। तो फिर मन और मस्तिष्क पर कितना तनाव पड़ा होगा! वे कितने अग्निमय, कितने तनावग्रस्त हो गए होंगे!

यह तो मुट्ठी में पकड़ी गई बाहरी वस्तु की बात थी। यदि किसी का अपना गहना, जिसे उसने संग्रह करके रखा था, वही चोरी हो जाए, तो मन और देह पर कितना आघात लगेगा! कितनों को तो हृदयाघात भी हो जाता है। किंतु ध्यान दें, जब कोई वस्तु या कोई घटना मन में ही पकड़ी रह जाए, वर्षों-वर्षों तक पकड़ी रह जाए, तब उस मानसिक ग्रिप से मस्तिष्क, इंद्रियाँ और सूक्ष्म अंग कितने पीड़ित हो जाते होंगे! क्या हम इस पर विचार करते हैं?

नहीं, विचार नहीं करते। क्यों? क्योंकि हम तनाव की उस धारा में बहे चले जा रहे हैं। तनाव की हमें ऐसी आदत, ऐसी लत पड़ गई है कि हमें पता ही नहीं चलता कि वह तनाव भी है। हम और हमारे सारे अंग निरंतर संकुचित हैं, निरंतर तनावग्रस्त हैं। इसी को तो मैं इंफ्लेमेशन कहता हूँ। तनाव का निरंतर बने रहना ही तो इंफ्लेमेशन है — चाहे वह देह में हो, मन में हो या इंद्रियों में। इसे ही समझना होगा, तभी अंतिम समाधान निकल सकता है। यहाँ यह भी समझना होगा कि बात नकारात्मक और सकारात्मक विचारों की नहीं है; बात मन द्वारा तनाव उत्पन्न करने की है। यदि सकारात्मक विचारों को भी आवश्यकता से अधिक समय तक मन द्वारा निरंतर पकड़े रखा जाए, तो वहाँ भी इंफ्लेमेशन की पूरी संभावना बन जाती है। आवश्यकता से अधिक समय तक पकड़े रहने का अर्थ ही उस वस्तु से आसक्ति , आदत , अर्थात् बुद्धिहीनता । 

जहाँ तक मेरे अपने साधनात्मक अनुभव रहे हैं, उनमें मुझे कोई नकारात्मक तनाव नहीं था। मैंने अपने साधनात्मक योग, ध्यान और प्राणायाम के अभ्यास को इतना अधिक किया कि उससे स्वयं तनाव उत्पन्न हो गया। उसी तनाव से देह में इंफ्लेमेशन हो गया था, जिसका मुझे भान भी नहीं था। 

योग या ध्यान करने का अर्थ यह कदापि नहीं है कि उसे दिन-भर किया जाए; अर्थात् मन को दिन-रात उन्हीं मांसपेशियों और नासिका के सूक्ष्म केंद्रों पर निरंतर लगाए रखा जाए। यदि मन किसी भी सूक्ष्म अंग को निरंतर पकड़े रखने की क्रिया करता रहे, भले ही वह सकारात्मक ही क्यों न हो, तब भी वह तनाव उत्पन्न करेगी। वह गलत है, क्योंकि मन इन सूक्ष्म केंद्रों को निरंतर तनाव देने की ऐसी लत पकड़ लेता है कि उन्हें ढीला नहीं कर पाता। वह ढीला करने के बारे में सोचता भी नहीं । क्योंकि वह तनाव देने में अभ्यस्त है , उस तनाव से प्रसन्नता प्राप्त करना चाहता अहि । क्योंकि उसने सुना है या उसको बताया गया है कि बस करो करते जाओ । 

किंतु जब तक मन उन्हें स्वतंत्र नहीं करेगा, तब तक वे अंग भी ढीले नहीं होंगे, क्योंकि मन ने आदतवश उन्हें पकड़ रखा है। इसी बुरी लत ने मेरी देह में इंफ्लेमेशन उत्पन्न कर दिया। पेट में निरंतर जलन, सिर का लगातार भारी रहना, छाती का भारी बने रहना, यहाँ तक कि कोलेस्ट्रॉल का ऊपर-नीचे होते रहना — ये सब उसी के परिणाम थे। और ऐसा भी नहीं था कि मेरे भोजन में कोई दोष था। भोजन तो सर्वोत्तम था। मैं वर्षों तक बिना तेल का भोजन करता रहा। यहाँ तक कि ग्यारह वर्षों तक बिना नमक का भोजन किया। किंतु परिणाम क्या हुआ? नकारात्मक।

समस्या तो भोजन की थी ही नहीं। समस्या सकारात्मक सोच की भी नहीं थी। वह सोच तो दिन-भर चल ही रही थी। समस्या थी दिन-रात सकारात्मक क्रिया करते रहने की, उसे पकड़े रहने की। समस्या थी दिन-भर प्राणायाम करने की, साँसों को दिन-भर देखते रहने की।

आख़िर साँसों को दिन-भर क्यों देखा जा रहा है? खाना खाते समय भी साँसों को देखने का क्या तुक है? उस समय भोजन के स्वाद का अनुभव करना आवश्यक है या साँसों को देखते रहना?

मूल समस्या केवल पकड़ने की थी। पकड़ने के अभ्यास में थी । अभ्यास ही पकड़ें का था । मन ने किसी सकारात्मक तत्व को पकड़ने का अभ्यास कर लिया था और उसी को निरंतर खींच रहा था। उसी पर अपनी खीझ निकाल रहा था। यही खीझ ही तो तनाव है। यही इंफ्लेमेशन है। मुझे पता ही नहीं था कि अभ्यास की गहराई में ही छोड़ना भी सीखा जाता है । 

कई वर्षों के बाद यह समझ आया कि मार्ग गलत था। समझ गलत थी।

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