गैस का पेट से न निकल पाना अक्सर एक साधारण शारीरिक समस्या समझ लिया जाता है, जबकि इसके पीछे एक सूक्ष्म और गहरी प्रक्रिया कार्य कर रही होती है। वास्तव में पेट से वायु तब तक सहज रूप से बाहर नहीं आ सकती, जब तक पेट की मांसपेशियाँ ढीली न हों। और मांसपेशियाँ तब तक ढीली नहीं होतीं, जब तक मन उन्हें ढीला छोड़ने की अनुमति न दे। यह अनुमति भी तभी संभव है, जब मन को यह बोध हो जाए कि वह स्वयं ही उन मांसपेशियों को अनजाने में जकड़े हुए है।
यहीं पर सबसे बड़ी समस्या उत्पन्न होती है—सामान्य मन को यह पता ही नहीं होता कि उसने अपने शरीर को कहाँ-कहाँ अनावश्यक रूप से खींच रखा है। व्यक्ति को यह ज्ञात नहीं होता कि बातचीत करते समय वह अपने माथे पर तनाव डाल रहा है, या बिना कारण अपने पैरों को हिला रहा है। उसे यह भी पता नहीं होता कि चलते-फिरते वह अपने पेट और गुदा द्वार को भीतर की ओर खींचे हुए है। यह सब इतनी सूक्ष्म और आदतन क्रियाएँ हैं कि वे उसकी जागरूकता से बाहर रहती हैं।
इसी अज्ञान के कारण व्यक्ति बार-बार यह प्रश्न करता हुआ दिखाई देता है कि “बिना किसी स्पष्ट तनाव के भी मेरा पेट हमेशा खिंचा हुआ क्यों रहता है?” उसे पेट में खिंचाव महसूस होता है, एक स्थायी कसाव बना रहता है, परंतु वह यह नहीं समझ पाता कि यह खिंचाव बाहर से नहीं, भीतर से—स्वयं के ही द्वारा निर्मित है।
इस खिंचाव से मुक्ति पाने के लिए वह अनेक दिशाओं में भटकता है। कभी उसे IBS (Irritable Bowel Syndrome) का नाम दे दिया जाता है, कभी ऑटोइम्यून विकार बताया जाता है, तो कभी आंतों में जीवाणुओं की असंतुलित स्थिति को कारण मान लिया जाता है। और यदि इन सब में भी संतोष न मिले, तो अंततः इसे मानसिक रोग का रूप दे दिया जाता है। परंतु इन सभी नामों के पीछे छिपी हुई वास्तविकता तक पहुँचना दुर्लभ ही होता है।
अंततः व्यक्ति स्वयं ही अपने ऊपर प्रयोग करने लगता है। वह भोजन के प्रति अत्यधिक कठोर हो जाता है—क्या खाए, क्या न खाए, किस समय खाए—इन सब पर असाधारण नियंत्रण स्थापित करने का प्रयास करता है। किंतु वहाँ भी उसे निराशा ही हाथ लगती है, क्योंकि समस्या का मूल भोजन में नहीं होता।
असल प्रश्न यह है कि व्यक्ति यह पहचान ही नहीं पाता कि उसकी समस्या बाहरी कारणों से उत्पन्न हुई है या स्वयं उसके ही द्वारा निर्मित है। और जब तक यह भेद स्पष्ट नहीं होता, तब तक समाधान भी संभव नहीं है।
यहाँ एक बात अत्यंत स्पष्ट रूप से समझनी होगी—मैं यह पूरे विश्वास के साथ कहता हूँ कि इस प्रकार की समस्या की जड़ स्वयं व्यक्ति के भीतर ही होती है। यह किसी बाहरी कारण का परिणाम नहीं, बल्कि अपनी ही अचेतन आदतों, जकड़नों और अनजानी पकड़ का प्रतिफल है।
जब तक इस सत्य का सीधा अनुभव नहीं होता, तब तक न तो शरीर वास्तव में ढीला हो सकता है, और न ही गैस जैसी साधारण प्रतीत होने वाली समस्या से वास्तविक मुक्ति संभव है।
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