जिसे संसार एकाग्रता कहता है, उसे मैं दो भागों में देखता हूँ — विषयगत एकाग्रता और साधनगत एकाग्रता।
संसार में प्रचलित एकाग्रता प्रायः विषयगत होती है — अर्थात् मन को किसी बाह्य विषय पर केन्द्रित करना। इस प्रक्रिया में साधक का समस्त ध्यान विषय पर होता है; मन पर नहीं, इन्द्रियों पर नहीं। जब यह विषयगत एकाग्रता अत्यंत गहरी हो जाती है, तो साधक को क्षणभर के लिए स्वयं का भान भी नहीं रहता। इसी अवस्था को अधिकांश लोग “ध्यान” कह देते हैं —कि ध्यान ऐसा लगा कि मैं स्वयं को ही भूल गया । किन्तु मेरे अनुभव में यह वास्तविक ध्यान नहीं है। एकाग्रता अवश्य है, किंतु ध्यान और एकाग्रता में वही अन्तर है जो दीपक और सूर्य में होता है।
एकाग्रता का मूल्यांकन केवल इस आधार पर नहीं होना चाहिए कि मन कहाँ टिक रहा है — बल्कि इस आधार पर भी होना चाहिए कि जिन साधनों के माध्यम से वह टिक रहा है, क्या उन साधनों पर भी मन की दृष्टि है?
यदि मन और इन्द्रियाँ — ये अन्तरंग साधन — उपेक्षित रहे, तो विषय में मिली सफलता की चमक साधक को भीतर से खोखला करती रहेगी। वह उस चमक को भोगेगा और उसी में विलीन हो जाएगा — जैसे चींटी मिठास की ओर खिंचती है और उसी गुड़ में समाकर नष्ट हो जाती है।
विषयगत एकाग्रता की एक और सीमा है — उसकी दूरदर्शिता अत्यन्त अल्प होती है। इसमें सबसे पहले विषय का सब्जबाग इतना अधिक दिखा दिया जाता है कि वह उसके पहले की प्रक्रिया पर ध्यान दिया ही नहीं जाता है । तभी तो उस विचार को जिसके लिए भागता है वह प्राप्त ही नहीं कर पाता है । थोड़े ही समय में कोई अन्य विषय आ जाता है , और अंततः विषय के के प्रति भागम भाग चलता रहता है ।
इसे एक उपमा से समझिए —यदि दूरबीन का लेंस ही धुँधला हो, तो आकाश बदलने से कुछ नहीं होगा। पहले लेंस को स्वच्छ करना होगा।
विषय पर एकाग्रता ठीक ऐसी ही है — उसके पूर्व उन साधनों को समझना होगा । मन विषय को पाकर सदा के लिए तृप्त हो जाना चाहता है, किन्तु यह सम्भव नहीं। एक विषय की तृप्ति दूसरे विषय की भूख को जन्म देती है। यह क्रम अनन्त है।
इसीलिए योग का मार्ग भिन्न है।
योग ध्यान का विज्ञान मन और इन्द्रियों को उसी लेंस की भाँति साधता है — उन्हें इतना निर्मल, इतना स्थिर बनाता है कि वे साधक को विषय तक नहीं, बल्कि विषय के अनुभवकर्ता तक पहुँचा देते हैं । आज शिक्षा, व्यवसाय और यहाँ तक कि अनेक साधना-पद्धतियाँ भी हमें लक्ष्य पर ध्यान देना सिखाती हैं। माता पिता शिक्षक हमेशा विषय को समझने के प्रति सतर्कता बताते हैं । किंतु मेरे अनुभव में शिक्षा के साथ साथ उन मौलिक साधनों के स्वास्थ्य के बारे में भी जानकारी देना उचित होगा । इसलिए भारतीय दर्शन पहले उस साधन की शुद्धि की बात करता है जिसके द्वारा देखा जा रहा है, सुना जा रहा है, अनुभव किया जा रहा है। इससे उत्तम और स्वस्थ परम्परा संसार में दुर्लभ है।
अतः यह सिद्ध है कि “योग का उद्देश्य केवल एकाग्रता नहीं, बल्कि एकाग्र करने वाले साधनों की रक्षा करना भी है।” यदि इन साधनों की रक्षा नहीं की गई, तो स्वास्थ्य कभी नहीं मिलेगा — न शारीरिक, न मानसिक, न आध्यात्मिक। इसीलिए मेरा यही कहना है —
“विषय से पहले साधन को स्वस्थ बनाइए। यही योग है, यही स्वस्थ एकाग्रता है।”
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