श्वास नहीं, अनुभूति—डीप चेस्ट ब्रीथिंग की वास्तविक दिशा
जब “डीप चेस्ट ब्रीथिंग” की बात होती है, तो सामान्य मन—जिसे हम साधारण या ले-मैन माइंड कह सकते हैं—तुरंत इसे लंबी, गहरी और चौड़ी सांस लेने से जोड़ देता है। उसके लिए प्राणायाम का अर्थ लगभग हर विधि में एक जैसा ही हो जाता है: लंबी सांस लो, गहरी सांस लो, उसे रोककर रखो, और फिर छोड़ो। चाहे वह अनुलोम-विलोम हो, उज्जाई , भ्रामरी, शीतली हो या कोई और प्राणायाम—प्रत्येक प्राणायाम का वही पैटर्न दोहराया जाता है। ऐसे में एक प्रश्न स्वाभाविक रूप से उठता है कि यदि प्रत्येक प्राणायाम में करना यही है, तो फिर उनके नाम अलग क्यों हैं?
यहीं पर समझ का एक सूक्ष्म लेकिन अत्यंत महत्वपूर्ण आयाम छूट जाता है। प्राचीन आचार्यों का आशय केवल सांस की लंबाई, गहराई या होल्डिंग से नहीं था, उनका संकेत उस आंतरिक बोध की ओर था, जो श्वास के माध्यम से शरीर और मन के सूक्ष्म क्षेत्रों में जागृत होता है।
जब हम “डीप चेस्ट ब्रीथिंग” कहते हैं, तो इसका वास्तविक अर्थ यह नहीं कि हम केवल लंबी और गहरी सांस लेकर छाती को भरें और इसी प्रकार छोड़ें । इसके पीछे का मूल अर्थ —मन की एकाग्रता उन उन स्थानों पर होनी चाहिए जिन जिन मांसपेशियों के माध्यम से साँसे अंदर और बाहर छोड़ी जा रही है । यहां ध्यान सांस पर नहीं, बल्कि छाती और साथ साथ रिब और अपर बैक पर होना चाहिए—ध्यान से देखें कि सांस को लंबी और गहरी बनाने में किन किन मांसपेशियों का उपयोग हो रहा है । उन्ही मांसपेशियों को अधिक प्राथमिकता देनी है । अर्थात् उसके छाती के फैलने (expansion) और सिकुड़ने (relaxation) की अनुभूति पर।
यदि ध्यान से देखें, तो यह बात हमारे अनुभव में पहले से मौजूद है। जैसे जब हम दौड़ते हैं, तो सांस स्वतः तेज हो जाती है। लेकिन उस समय हमारा ध्यान सांस पर नहीं होता, बल्कि छाती की गति पर होता है—कैसे वह तेजी से ऊपर-नीचे हो रही है, कैसे उसमें दबाव और विस्तार आ रहा है। उसी प्रकार भस्त्रिका में भी, गति और बल दोनों चेस्ट के एक्सपेंशन और स्क्वीजिंग में होते हैं; सांस केवल उसका परिणाम होती है।
यही सिद्धांत डीप चेस्ट ब्रीथिंग में लागू होता है। जब मन की एकाग्रता का केंद्र छाती के विस्तार और पिचकने पर टिकता है, तब श्वास अपने आप गहरी और लंबी हो जाती है। तब साँसों के अंदर “ब्रीथ इन” और साँसों के बाहर अर्थात् “ब्रीथ आउट” प्राथमिक नहीं रहते, बल्कि द्वितीयक हो जाते हैं। आपका ध्यान इस बात पर होता है कि छाती कितनी धीरे-धीरे फैल रही है, कैसे सिकुड़ रही है, उस प्रक्रिया में क्या सूक्ष्म परिवर्तन हो रहे हैं—फ्रंटल चेस्ट में, अपर बैक में, रिब्स के आसपास।
यहाँ एक महत्वपूर्ण ज्ञान व बोध प्रकट होता है कि: साँसों में अपनी कोई शक्ति नहीं होती है । वे न तो स्वतः अंदर और न ही स्वतः बाहर जा सकती हैं । बोध यह होता है कि कौन कौन से अंग साँसों को अंदर लेने में सहयोग करते हैं । यदि उन अंगों को अच्छी तरह से स्वभाव में लाया जाए और उन सभी मांसपेशियों के मजबूत कर दिया जाए तो सांसों के अंदर और बाहर निकलने की प्रक्रिया स्वतः ही स्वाभाविक हो जाएगी । अर्थात इस “डीप चेस्ट ब्रीथिंग” प्रणाली में मन की एकाग्रता उन सहयोगियों पर अधिक होती है जो सांसों को अंदर और बाहर ले जाते हैं बनिस्बत कि ध्यान सांसों के अंदर बाहर करने पर ।
जब हम हर प्राणायाम को केवल लंबी, गहरी और होल्डिंग तक सीमित कर देते हैं, तो हम मन को एक ही ढर्रे में बांध देते हैं। इससे मन की सूक्ष्म रूप से “स्विचिंग” की क्षमता विकसित नहीं हो पाती—यानी यह समझ कि किस प्राणायाम में ध्यान किस बिंदु पर केंद्रित होना चाहिए। यही कारण है कि लोग अक्सर कहते हैं, “प्राणायाम करते समय मन टिकता नहीं।” वास्तव में मन इसलिए नहीं टिकता क्योंकि उसे कोई विशिष्ट, जीवंत केंद्र नहीं दिया गया—वह केवल सांस की यांत्रिक प्रक्रिया में उलझा रहता है।
जब मन चेस्ट के मूवमेंट पर टिकता है, तब केवल श्वसन प्रणाली ही नहीं, बल्कि उससे जुड़े मांसपेशीय क्षेत्र—चेस्ट और अपर बैक—भी सक्रिय और सशक्त होते हैं। यह एक गहराई की ओर ले जाने वाला मार्ग है, जहाँ मन सूक्ष्म स्तर पर कार्य करना सीखता है ।
इस प्रकार, डीप चेस्ट ब्रीथिंग का सार यह नहीं है कि हम “कैसे सांस लें”, बल्कि यह है कि मन का प्राणायाम करते समय प्राथमिक एकाग्रता कहाँ होनी चाहिए ।
और जब यह स्पष्ट हो जाता है, तब प्राणायाम केवल एक श्वास तकनीक नहीं रह जाता—वह एक आंतरिक जागरूकता की प्रक्रिया बन जाता है।
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