मनुष्य की ऐक्षिक प्रकृति आदिकाल से ही अपने जीवन को लंबा करने की आकांक्षा में जीती आई है। यही आकांक्षा कभी अमृत की खोज बनती है, कभी संजीवनी की कथा, और कभी आधुनिक समय में दवाइयों, सप्लीमेंट्स और तथाकथित मनोवैज्ञानिक सूत्रों का रूप ले लेती है। आयुर्वेद जीवन को स्वास्थ्य के माध्यम से दीर्घ करने की बात करता है, योग और ध्यान आचरण, श्वास और चेतना के संतुलन से जीवन की गुणवत्ता और आयु को समझने की दृष्टि देते हैं। इन सभी में एक समान तत्व है—अनुशासन, समझ और जिम्मेदारी।
लेकिन जब यह जिम्मेदारी भारी लगने लगती है, तब मनुष्य अंधविश्वास की गोद में जाकर बैठ जाता है। वहाँ नियम सरल होते हैं, परंतु खोखले।
इसी खोखलेपन का एक उदाहरण है यह धारणा कि जो लोग छोटा हस्ताक्षर करते हैं, उनका जीवन भी छोटा होता है। मानो जीवन की आयु किसी जैविक प्रक्रिया से नहीं, बल्कि कलम के फैलाव–सिकुड़न से तय होती हो। यह विचार सुनते ही यह स्पष्ट हो जाना चाहिए कि जहाँ रहस्य का दावा शुरू होता है, वहीं विवेक को अवकाश दे दिया जाता है। यदि हस्ताक्षर ही जीवन की अवधि तय करते, तो प्रकृति को अब तक लेखन सिखा देना चाहिए था। पेड़, कछुए, व्हेल—जो मनुष्य से कई गुना अधिक जीते हैं—उन्होंने किस शैली में साइन किए? और जो कम आयु में चले गए, उनके हस्ताक्षर किस आकार के थे?
प्रकृति न हस्ताक्षर देखती है, न लिखावट। वह श्वास की लय, कोशिकाओं की मरम्मत, आहार की गुणवत्ता, मानसिक तनाव और चेतना की स्थिरता को पहचानती है। जीवन की घड़ी किसी बैंक खाते में जमा साइन को नहीं पढ़ती; वह शरीर और मन के भीतर चल रही प्रक्रियाओं को पढ़ती है।
यहाँ एक और प्रश्न अपने आप खड़ा हो जाता है—जो लोग अनपढ़ हैं, जो हस्ताक्षर करना जानते ही नहीं, जो केवल अंगूठा लगाते हैं, उनका जीवन किस आधार पर तय होगा? क्या उनका जीवन शून्य मान लिया जाए? या अंगूठे की गोलाई, दबाव और स्याही के फैलाव से वर्षों की गणना होगी? यदि साइन न करने वाला भी जी रहा है, बूढ़ा हो रहा है, अस्सी–नब्बे वर्ष पूरे कर रहा है, तो यह पूरा सिद्धांत अपने ही भीतर ढह जाता है।
दरअसल, ऐसे अंधविश्वास तर्क से नहीं, मानसिक सुविधा से जन्म लेते हैं। जीवनशैली सुधारना कठिन है—अपने भोजन पर ध्यान देना, नींद को प्राथमिकता देना, क्रोध और भय को समझना, तनाव के साथ बैठ पाना—यह सब श्रमसाध्य है। इसके विपरीत, एक आसान-सा नियम गढ़ लेना अत्यंत सुखद है: साइन छोटा है, इसलिए खतरा है; साइन बड़ा कर लो, जीवन सुरक्षित हो जाएगा। इसमें न आत्मनिरीक्षण चाहिए, न आचरण में परिवर्तन—बस कलम को थोड़ा और खींच दो।
यदि यह सिद्धांत सच होता, तो कृपया इसका गणित भी स्पष्ट कर दिया जाए। कितने मिलीमीटर के हस्ताक्षर पर कितने वर्ष बढ़ते हैं? लोग अभ्यास शुरू कर देंगे, साइन फैलते जाएँगे, चेकबुक छोटी पड़ जाएगी, और बैंक नई, लंबी चेकबुक छापने पर मजबूर हो जाएँगे। मनुष्य की सरलता देखिए—जहाँ जीवन भर का श्रम चाहिए, वहाँ वह पीछे हट जाता है; और जहाँ कलम का एक स्ट्रोक काफी बताया जाए, वहाँ वह दौड़ पड़ता है।
इस पूरे भ्रम का सबसे बड़ा लाभ यह है कि जिम्मेदारी किसी और पर डाल दी जाती है। बीमार हो गए—साइन छोटा था। थकान है—हस्ताक्षर ठीक नहीं। आयु कम हुई—कलम दोषी है। इस तरह जीवन के असंतुलन का दोष भोजन, नींद, विचार और व्यवहार पर न डालकर एक काग़ज़ पर उतार दिया जाता है। यह आत्म-प्रवंचना का सबसे आरामदेह रूप है।
और अंत में एक प्रश्न, जो अक्सर अनसुना रह जाता है—जो यह उपदेश दे रहे हैं, उनका अपना जीवन कितना संतुलित है? क्योंकि उपदेश तभी विश्वसनीय होता है, जब वह अपने ऊपर लागू हो। दूसरों को भ्रम में रखना एक बात है, पर स्वयं को भ्रम में रखना उससे भी गहरा अंधकार है।
विवेक चुपचाप यही कहता है कि जीवन की लंबाई हस्ताक्षर से नहीं तय होती। वह हमारी समझ, हमारे आचरण, हमारी श्वास की गहराई, हमारी मानसिक स्पष्टता और प्रकृति के साथ हमारे संतुलन से तय होती है। और इससे भी अधिक गहरी बात यह है कि जीवन की लंबाई से अधिक महत्वपूर्ण है उसकी गुणवत्ता—जिसे न बड़ा साइन दे सकता है, न छोटा। यह केवल जागरूक जीवन दे सकता है।
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