बीमारी अचानक नहीं होती —अनदेखी का परिणाम
जब कोई पूछता है कि क्या लिवर की समस्या या सोरायसिस अचानक हो जाती है, तो यह प्रश्न केवल बीमारी के बारे में नहीं होता—यह हमारी समझ के बारे में होता है। क्योंकि वास्तविकता यह है कि शरीर में उत्पन्न होने वाली अधिकांश बीमारियाँ अचानक नहीं आतीं; वे धीरे-धीरे, वर्षों के भीतर, हमारे ही जीवन के पैटर्न में पनपती रहती हैं ।
अचानक हमें केवल उनका ज्ञान होता है—बीमारी नहीं।
जीवनशैली की एक बड़ी विशेषता यह है कि वह धीरे-धीरे आदत बन जाती है, और आदत इतनी सामान्य लगने लगती है कि हम उसे समस्या मानना ही बंद कर देते हैं। जैसे वर्षों से चला आ रहा कॉन्स्टिपेशन व्यक्ति के लिए “सामान्य” बन जाता है। वह उसमें ही स्वयं को संतुष्ट कर लेता है । सत्य तो यह है कि वह झूठ नहीं बोल रहा होता जब यह कहता है कि उसे कब्ज़ से संबंधित कोई समस्या नहीं है—वह सच में यही मान बैठा है कि जो हो रहा है, वही सही है।
यही बात नींद में भी दिखाई देती है। व्यक्ति कहता है कि उसे अच्छी नींद आती है, जबकि वह खर्राटे ले रहा होता है, सपनों में उलझा हुआ है, पूरी रात विचारों में ही उलझा हुआ रहता है और उसकी नींद गहरी नहीं है। परंतु चूँकि वह इन अवस्थाओं में इतना अभ्यस्त हो चुका हुआ होता है कि उसे यही सामान्य प्रतीत होता है। उसे यह लगता है कि यही नींद है । यहाँ समस्या शरीर में नहीं, बल्कि उस संवेदनशीलता के लुप्त हो जाने में है, जिससे हम शरीर के संकेतों को पहचान सकें।
यही अनदेखी धीरे-धीरे शरीर के भीतर एक ऐसा वातावरण बना देती है, जहाँ बीमारी पनपने लगती है। अप्रत्यक्ष रूप से सूक्ष्म मन उन उन भोजन तत्वों की ओर आकर्षित होने लगता है जो उसे थोड़ा आत्म संतोष देता है , नींद लेने में अधिक सहायता देता है । देर रात तक शराब लेना, सोने से ठीक पहले भोजन करना, या फर्मेंटेड चीजों का अधिक सेवन—ये सब शरीर के भीतर सूक्ष्म स्तर पर प्रतिक्रियाएँ उत्पन्न करते हैं। रात में जब शरीर को विश्राम की आवश्यकता होती है, तब यदि पाचन तंत्र सक्रिय हो जाता है, तो शरीर में सूजन (swelling) और असंतुलन बढ़ने लगता है। यह प्रक्रिया हर उम्र में समान रूप से होती है—चाहे बच्चा हो या वयस्क—केवल अंतर इतना है कि बढ़ते शरीर में यह तुरंत स्पष्ट नहीं होता।
इस प्रकार, बीमारी वास्तव में जीवनशैली के उसी क्षण से शुरू हो जाती है, जब हमने असंतुलित आदतों को अपनाना शुरू किया था। परंतु चूँकि यह प्रक्रिया धीमी होती है, इसलिए हमें इसका आभास बहुत देर से होता है।
अब प्रश्न यह उठता है कि जब बीमारी स्पष्ट हो जाए, तब क्या उसे केवल जीवनशैली बदलकर पूरी तरह ठीक किया जा सकता है?
उत्तर सरल भी है और जटिल भी। यदि स्थिति अत्यधिक गंभीर नहीं हुई है, तो शरीर में अद्भुत क्षमता होती है स्वयं को पुनर्संतुलित करने की। लेकिन यदि अवस्था बहुत आगे बढ़ चुकी है, तो पूर्ण रूप से रिवर्स होना कठिन हो सकता है—हालाँकि सुधार की दिशा में परिवर्तन अवश्य संभव है।
यहीं योग की भूमिका प्रारंभ होती है। हठयोग की परंपरा में कुछ ऐसे आसन और प्राणायाम विकसित किए गए हैं, जो शरीर को “रेस्टिंग स्टेट” में ले जाने की क्षमता रखते हैं। यह केवल आराम करना नहीं है, बल्कि एक गहरी जैविक शांति है, जहाँ मांसपेशियाँ, तंत्रिका तंत्र और आंतरिक अंग—विशेष रूप से लिवर जैसे प्रमुख अंग—विश्राम का अनुभव करते हैं।
और यही वह अवस्था है, जहाँ हीलिंग स्वतः प्रारंभ होती है।
हम शरीर को ठीक नहीं करते; शरीर स्वयं में ही अपना उपचार करता है—यदि उसे सही परिस्थिति दी जाए। भोजन भी एक सीमा तक सहायक है, परंतु वास्तविक उपचार गहरे विश्राम (deep rest) और गहरी नींद (deep sleep) में निहित है। जब शरीर विश्राम में जाता है, तभी उसकी आंतरिक मरम्मत प्रणाली सक्रिय होती है।
इसलिए, प्रयास कभी बंद नहीं होना चाहिए। चाहे स्थिति कैसी भी हो, यदि जीवन में अनुशासन लाया जाए, योगिक विधियों का पालन किया जाए, और शरीर को विश्राम की वास्तविक अवस्था में ले जाया जाए, तो परिवर्तन संभव है—कभी-कभी इतना गहरा कि बीमारियाँ पूरी तरह समाप्त हो जाती हैं।
अंततः, बीमारी कोई अचानक घटना नहीं है—वह हमारी ही जीवनशैली का एक धीमा, मौन प्रतिबिंब है।
और उसी जीवनशैली में परिवर्तन, उसके समाधान का पहला द्वार भी है।
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