Loading...
...

भय बाहर नहीं है, दृष्टि में है

3 weeks ago By Yogi Anoop

भय बाहर नहीं है, दृष्टि में है

इस संसार को लेकर मनुष्य की एक बड़ी भ्रांति यह है कि वह अपने अनुभवों का कारण बाहर की परिस्थितियों में खोजता है। वह मान लेता है कि भय बाहर है, नकारात्मकता बाहर है, संकट बाहर है। परंतु यदि थोड़ी गहराई से देखा जाए, तो यह स्पष्ट होने लगता है कि बाहर वस्तुएँ हैं, घटनाएँ हैं—पर भय नहीं है। भय देखने वाले की दृष्टि में है। संसार में सब कुछ है—सुख भी, दुःख भी; प्रकाश भी, अंधकार भी। किंतु इनमें से क्या आपको प्रभावित करेगा, यह इस बात पर निर्भर करता है कि आपकी दृष्टि किस ओर केंद्रित है। जिस स्थान पर आप अपना फोकस रखते हैं, वही आपकी अनुभूति बन जाता है।

मैं कहता हूँ कि बाहर वास्तव में कुछ भी नहीं है; सब कुछ सोच में घटित हो रहा है। प्रकृति अपने आप में निष्पक्ष है। उसमें न कोई दोष है, न कोई गुण। दोष केवल दृष्टि में होता है। नेगेटिव और पॉजिटिव—ये दोनों शब्द वास्तविकता के नहीं, बल्कि मन के हैं। यदि आप किसी खाली दीवार को लगातार देखते रहें, तो कुछ समय बाद वहाँ आपको भगवान भी दिखाई दे सकते हैं और भूत भी। जबकि सत्य यह है कि आपने न कभी भगवान को प्रत्यक्ष देखा है, न भूत को। दीवार में वास्तव में कुछ भी नहीं है। जो दिखाई देता है, वह आपके भीतर की छवि है, आपकी दृष्टि की उपज है। इसी तथ्य का बोध हो जाना ही ज्ञान कहलाता है।

एक बार मैं विदेश में एक मित्र के यहाँ ठहरा था। उन्होंने एक बंद कमरे की ओर संकेत करते हुए बताया कि कई वर्षों से उस कमरे में कोई नहीं जाता, क्योंकि उसी कमरे में उनके पति की मृत्यु हुई थी। उनका विश्वास था कि आज भी उनकी आत्मा वहीं वास करती है और रात में आवाज़ें आती हैं। मैंने उनसे कहा—मैं आज उसी कमरे में सो जाऊँगा। जैसा कि मुझे पहले से ज्ञात था, रात में कुछ भी नहीं हुआ। सुबह देखा कि परिवार के लोग बाहर खड़े थे, मानो यह देखने आए हों कि मैं जीवित हूँ या नहीं। मैंने जानबूझकर कहा कि अब वे मुक्त हो गए हैं। परिवार प्रसन्न हो गया।

यहाँ भय की समस्या तो समाप्त हो गई, किंतु एक नई बीमारी ने जन्म ले लिया—गुणगान की बीमारी। अब चर्चा यह होने लगी कि गुरुजी कितने महान हैं। यह प्रचार भय से भी अधिक ख़तरनाक है, क्योंकि भय में तो पीड़ा स्पष्ट दिखती है, पर गुणगान में भ्रम छिपा रहता है। सब कुछ सुंदर प्रतीत होता है, अच्छे हार्मोन उत्पन्न होते रहते हैं, और माया और गहरी हो जाती है।

वर्षों बाद उन्हें स्वयं के भीतर यह समझ आई कि कमजोर मन ही भय और अच्छाई—दोनों की रचना करता है। मन जितना कमजोर होता है, उतना ही भय भी रचता है और उतना ही आदर्शों, देवताओं और महिमामंडन का जाल भी बुनता है। यही माया है। यह संसार माया नहीं है—माया तो दृष्टा की दृष्टि में है।

नोट—यदि और गंभीरता से मनुष्य की दृष्टि का आकलन किया जाए, तो एक गहरी विडंबना सामने आती है। वही पति जब जीवित था, तब उसे मरने नहीं देना चाहते थे, और अब उसकी मृत्यु के बाद उसी की भूतात्मा को उसके ही कमरे में रखना भी स्वीकार नहीं है। जीवन में हम जिसे पकड़ना चाहते हैं, मृत्यु में उसी से भागते हैं। तब प्रश्न उठता है—आख़िर हम चाहते क्या हैं? व्यक्ति को नहीं, बल्कि अपनी ही कल्पनाओं को बचाए रखना चाहते हैं। यही असली भ्रम है, और यही भय का मूल स्रोत भी।

Recent Blog

Copyright - by Yogi Anoop Academy