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अधःगति और अधोगति

2 weeks ago By Yogi Anoop

अधःगति और अधो गति 

जहाँ नीचे की ओर गति के प्रवाह की सहजता को ही मैं अधः गति कहता हूँ । इस सहजता में भय (रोग) टिक नहीं पाता। प्रकृति में छोड़ना और पकड़ना दोनों ही सहज है, ध्यान दें प्रकृति में न क्रिया है और न अक्रिया है , उसमें बस प्रक्रिया है । क्रिया होने का तो अर्थ है कि कर्ता का बोध और अक्रिया का अर्थ है कर्ता को अकर्ता का बोध हो गया । 

जैसे साँसों का अंदर आना और बाहर निकलना एक प्रक्रिया है । साँसों के अंदर आने पर स्वाभाविक संकुचन और निकलने पर स्वाभाविक विश्राम होता ही है । चाहे आप इसे अनुभव करें अथवा नहीं करें वह अपनी प्रक्रिया में चल रही होती है । यह इसमें आप कुछ भी नहीं कर रहे हैं , यही उसकी अपनी प्रक्रिया है , स्वभाव है । संकुचन और विश्राम उसका अपना स्वभाव है ।  

किंतु जब अंदर आने वाली साँसों में वह जबरन गहरी साँस अंदर भरने लगता है तब होने वाले उस उस संकुचन को क्रिया कहेंगे । और जब साँसों के बाहर छूटने पर वह साँसों को स्वतः छोड़ने की अनुभूति करता है तब उसे अक्रिया कहेंगे । अर्थात् अंदर लेने वाली साँसों में उसने स्वयं में कर्ता का भाव था और बाहर छूट जाने वाली साँस में उसमें अकर्ता का भाव था । 

अब थोड़ा और गहराई में चलते हैं ; जब उसने साँसों को अंदर भरा था तो उसने कर्तृत्व की अनुभूति की थी अर्थात् यह अनुभव कि उसने साँसों को अंदर ग्रहण किया । ध्यान दो अब,  इस कर्तृत्व में उसको प्रयास करना पड़ा । यह प्रयास , यह प्रयत्न ही उसे थकाता है । अब यदि इस प्रयत्न के तरीके बहुत उत्तेजना से पूर्ण रहे तो उसी तरह से थकान होगा । और यदि यह प्रयत्न में कर्ता के द्वारा विवेकका प्रयोग किया गया तो थकान कम से कम होगा । और जो होगा भी , वह साँसों को छोड़ने में समाप्त कर लेगा । 

अब साँसों को छोड़ने पर विवेचन किया जाय; साँसों को छोड़ने में उसका ध्यान तो था किंतु उसने यह अनुभव किया कि वह स्वतः चली गई , जैसा कि इसका स्वभाव था । फेफड़ों में छोड़ने का स्वभाव तो था ही , बस साँसों को बाहर जाते समय उसने उसके स्वतः छूटने का बोध कर लिया ।उसने अपनी अज्ञानता को दूर किया जिसमें संकुचन करने वाला हस्तक्षेप निहित था ।  अर्थात् उसने साँसों को छोड़ने में संकुचन जैसा कोई प्रयत्न ही नहीं किया । उसने तो केवल साँसों के स्वतः जाने का बोध किया अर्थात् उसने स्वयं के अंदर अक्रियत्व का बोध कर लिया । ध्यान दें साँसों का बोध से कहीं अधिक उसने स्वयं का बोध किया । साँस तो अपने स्वभाव के अनुसार चल ही रही थी । उसने स्वयं में बोध किया कि मैं उसी के अनुरूप मैं भी अकर्ता हूँ , मैंने उसको छोड़ने का बोध कर लिया । 

अब और ध्यान दें,  वह पहले ही कर्ता था क्योंकि उसमें हर प्रक्रिया (पूरक और रेचक) में क्रिया और क्रिया ही नहीं अतिक्रिया  करने की आदत थी । अब रेचन में उसने अकर्तापन का अनुभव करते हुए साँसों के छूटने का बोध कर लिया । अर्थात् उसने साँसों की सहजता का पूर्ण बोध कर लिया । और साँसों की सहजता का बोध इसलिए ही कर पाया कि वह स्वयं सहज हो चुका था । 

अब और ध्यान दे समझने का प्रयास करें - श्वास को स्वतः छोड़ने का अनुभव अर्थात् उसकी सहजता का अनुभव से उसको स्वयं में अक्रियत्व का बोध होने लगता है । यही अक्रियत्व का बोध ही उसे स्वस्थ (स्वयं में स्थित) बना देता है । स्वस्थ का मूल अर्थ स्वयं में स्थित होना ही है अर्थात् जब वह स्वयं में स्थित होने लगता है तब उसके सभी अंग भी अपने स्वभाव में स्वतः ही और अच्छे रूप में कार्य करने लगते हैं जब कि पहले उसके हस्तक्षेप से ही परेशान थे  । पहले वे इसलिए भी स्वस्थ नहीं थे इसलिए कि कर्त्ता ने हमेशा हस्तक्षेप कर रखा था । 

अर्थात् यह सिद्ध है कि जहाँ सहजता का बोध हो चुका हो, वहीं रोगों का अभाव सम्भव हो सकता है । इसका अर्थ यह है कि जहाँ कर्ता के द्वारा समाधान निकालने के लिए संकुचन पर संकुचन अधिक होता जाता है, तो वहीं पर समझ लो कि मन में रोग जन्म ले चुका है — क्योंकि कर्तृत्वपन की जितना अधिक अनुभव होगा उतना ही अधिक अंतर्मन में रोग होगा और उसका शरीर पर दुष्प्रभाव आज नहीं तो कल अवश्य ही देखने को मिलेगा । क्योंकि कर्तित्वपन की चरम अनुभूति मृत्यु (कष्ट) है और उसी कर्तृत्व के विपरीत अकर्तापन का अनुभव संकुचन के अभाव का अनुभव करवा देता है तो वह मोक्ष है । यही तो स्वास्थ्य है । 

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