अपान वायु पर नियंत्रण — छोड़ने की कला का दार्शनिक और आयुर्वेदिक अर्थ
अपान वायु पर नियंत्रण का प्रश्न प्रायः लोगों को किसी क्रिया, किसी संकुचन या किसी ज़ोर से किए गए अभ्यास की ओर ले जाता है। किंतु यदि इसे गहराई से, दार्शनिक अनुभव और आयुर्वेदिक दृष्टि से समझा जाए, तो स्पष्ट होता है कि अपान वायु का संतुलन नियंत्रण करने से नहीं, बल्कि छोड़ने से होता है। यहाँ “छोड़ना” केवल साँस को बाहर निकालना मात्र नहीं है, बल्कि अस्तित्व के उस गहरे बोध को स्वीकार करना है, जहाँ शरीर, मन और प्राण अपनी स्वाभाविक प्रकृति और प्रवाह में लौट आते हैं।
जब मैं कहता हूँ कि “साँसों को निकालने पर नहीं, साँसों को छोड़ने पर ध्यान दें”, तो इसका अर्थ अत्यंत सूक्ष्म है। इसमें गूढ़तम दर्शन छिपा हुआ होता है। इसका बोध केवल अनुभव करने से ही हो सकता है। साँस निकालना एक क्रिया है—उसमें कर्ता-भाव छिपा होता है। इस “निकालने” की क्रिया में कर्ता कुछ कर रहा होता है। जैसे कुएँ में पानी भरा हो और बाहर से उस कुएँ से बाल्टी के द्वारा पानी निकाला जा रहा हो। फेफड़ों में साँसें भरी हुई हैं और कोई उन्हें निकाल रहा हो। मैं इस देह में साँस निकालने की उस क्रिया को, जिसमें कर्ता का बोध होता है, नहीं मानता। प्रकृति में यह स्वाभाविक नहीं है।
जबकि साँस छोड़ना अकर्ता का ही अनुभव करवाती है। यद्यपि फेफड़ों में लेने और छोड़ने की क्रिया स्वाभाविक ही है, किंतु जब मैं साँसों के छोड़ने की बात करता हूँ, तो उसमें कर्ता—अर्थात् साँस को छोड़ने वाला—साँसों को उनके स्वभाव पर ही छोड़ देता है। वह केवल उस छोड़ने को अनुभव करता है।
वह छोड़ने में हस्तक्षेप नहीं करता, केवल बाधा नहीं डालता। जैसे ही उसका हस्तक्षेप कम होता जाता है, वैसे ही अपान वायु, जो स्वभावतः अधोमुखी है, अपने मार्ग को स्वयं खोजने लग जाती है। उस समय नीचे की ओर प्रवाह (डाउनवर्ड विंड) किसी प्रयास से नहीं, बल्कि सहजता से प्रारंभ होता है।
ध्यान दें, यहाँ रेचक—अर्थात् साँसों को छोड़ने के बोध—के माध्यम से रेचन, अर्थात् मलोत्सर्ग, स्वभावगत हो जाता है। उसका मूल स्वभाव, जो अधोमुखी है, पूर्ण रूप से अपने स्वभाव में आ जाता है। इसलिए जब मैं यह कहता हूँ कि आध्यात्म में प्रकृति का बोध होने पर पुरुष का तो बोध होता ही है, साथ ही प्रकृति में दिए गए ऐक्षिक असंतुलन भी समाप्त होने लगते हैं।
इसी प्रकार आयुर्वेद में भी अपान वायु का क्षेत्र मूलाधार से लेकर नाभि तक माना गया है—मलोत्सर्ग, मूत्रोत्सर्ग, शुक्र-आर्तव स्राव, यहाँ तक कि गर्भधारण और प्रसव तक की सारी प्रक्रियाएँ इसी अधोमुखी वायु से जुड़ी हैं। ध्यान देने योग्य बात यह है कि ये सभी क्रियाएँ तभी स्वस्थ रूप से घटित होती हैं, जब छोड़ने की क्षमता बनी रहती है। जहाँ पकड़ अधिक होती है—मांसपेशियों में, श्वास में या मन में—वहीं अपान वायु विकृत होने लगती है।
जैसे-जैसे साधक साँस छोड़ने की कला में पारंगत होता जाता है, वैसे-वैसे शरीर का निचला भाग—पेल्विस, उदर और गुदा क्षेत्र—अनजाने ही ढीला होने लगता है। यह ढीलापन कोई ढर्रागत रिलैक्सेशन नहीं है, बल्कि एक गहरी स्वीकृति है। इसी बोध में वास्तविक रेचन घटित होता है। यहाँ रेचन किसी औषधि से कराया गया विरेचन नहीं, बल्कि प्राणों द्वारा स्वयं किया गया शुद्धिकरण है। और यही स्थिति रेचक कहलाती है—जहाँ छोड़ना ही साधन बन जाता है।
दार्शनिक दृष्टि से देखें तो अपान वायु केवल शरीर की वायु नहीं है; यह हमारे जीवन में “छोड़ पाने”, अर्थात् त्याग की क्षमता का भी प्रतीक है। जो अपना नहीं है, उसका यदि ठीक प्रकार से बोध हो जाए, तो त्याग स्वतः हो जाता है; त्याग करना नहीं पड़ता। जो व्यक्ति विचारों, भावनाओं और बीते अनुभवों को छोड़ नहीं पाता, वह शारीरिक स्तर पर भी अपान-विकारों से ग्रस्त होता है। कब्ज, भारीपन, जड़ता और भय—ये सभी अपान वायु के असंतुलन के संकेत हैं। और इनका समाधान भी उसी दिशा में है—कम करना, ढीला छोड़ना और नियंत्रित करने की आकांक्षा का त्याग।
इसलिए मैं अनुभवपूर्वक कहता हूँ कि जब साँस छोड़ते समय सचमुच कुछ भी करना नहीं रह जाता, उसी क्षण अपान वायु अपने वास्तविक स्वरूप में प्रवाहित होने लगती है। वहाँ कोई तकनीक नहीं बचती; केवल बोध और गहरा अनुभव ही शेष रहता है। यह प्रसन्नता पाने या छोड़ने का नहीं, बल्कि जानने का होता है—कि कितने वर्षों से सब कुछ मेरे ही सामने था, किंतु मैं उसका बोध नहीं कर पाया, और आज मैंने उसका बोध कर लिया।
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