सामान्य से सामान्य मन, इक्षाओं से से खचाखच भरा मन भी कुछ पलों के लिए उन सभी शर्तों से , समय से , स्थान से, यहाँ तक कि उसे यह भान भी न हो हो कि वह कहाँ पर है , वह कौन सा जेंडर है , होने से मुक्त होना चाहता है । इसीलिए उसे कभी-कभी ऐसा लगता है कि यदि स्वयं मिट जाएँ तो शायद शांति मिल जाएगी। कुछ वैसा ही अनुभव, जैसा गहन निद्रा में —जहाँ मानो हम स्वयं को भूल जाते हैं। यहाँ मिटने का मूल अर्थ वास्तव में स्वयं को भुला देने से है। उस अवस्था में हमें यह ज्ञात नहीं रहता कि हम कहाँ हैं, कौन हैं और किस स्थिति में हैं।
अर्थात् मन की छाए वह भौतिक मन हो अथवा आध्यात्मिक मन हो , उसकी सदैव से ही एक गहरी चाहत रही है कि वह काल से अकाल में और नाम से अनाम में विलीन हो जाए। भौतिक मन नींद में चला जाता है जिसमें उसको किसी ज्ञान की आवश्यकता नहीं रहती है । अज्ञात रूप से उसका सूक्ष्म मन की भी यही छत रहती है कि स्मृतियों से बाहर कैसे चला जाये । स्मृति का अर्थ ही है कि मैं पुरुष हूँ अथवा स्त्री हूँ । स्मृति का अर्थ ही द्वैत । उसे अपने होने का एहसास न रहे, न स्वयं की कोई स्मृति बचे और न ही इस देह का बोध रहे। शायद इसीलिए मन कहीं न कहीं वही चाहता है, जो वह गहन निद्रा में अनुभव करता है—स्वयं के बोध से कुछ समय के लिए मुक्त हो जाना। सत्य तो यह है कि उस सामान्य व्यक्ति का मन स्थूल और सीमित है जो स्वयं को एक पुरुष और स्त्री के रूप में अनुभव करता है ।
ध्यान दें उस सामान्य व्यक्ति का भी सूक्ष्म मन सबके परे जाना चाहता है । यही उसके जीवित रहने का एकमात्र तरीका है । यदि इसके परे नहीं जा पाएगा तो आत्म संतुष्ट होकर जीवित न रह सकेगा । उसका देह , उसकी इन्द्रिय उसका मन रोगी हो जाएगा । इसलिए प्रकृति ने गहन निद्रा को सबसे बड़ा उपहार के रूप में मनुष्य को दिया । ताकि चाहकर व न चाहकर सबकुछ छोड़-छाड़कर चला जाए है । यद्यपि वह जाता नहीं उसे उसके अंदर का स्वभाव उठा ले जाता है ।
किंतु व्यक्ति जिसका मन थोड़ा सूक्ष्म है , जो आध्यात्मिक है, वह चाहता है कि वह शून्यता में जाये । वह शून्यता की यात्रा करे । वैसी ही जैसे गहन निद्रा की यात्रा होती है , जिसमें अपार शांति प्राप्त होती है । संभवतः इसलिए लिए वह आसमान की तरफ़ प्रेरित हुआ । किंतु आसमान का अर्थ उसने बाहरी आसमान , ऊपर दिखने वाले आसमान को ले लिया । शायद सीलिए उसने यह विचार किया कि उसी आसमान में स्वयं को विलीन कर देगा । किंतु ध्यानात्मक और व्यावहारिक दृष्टि से यह संभव ही नहीं है । वह इसलिए कि एक बूँद दूसरे बूँद में विलीन तो हो सकती है किंतु एक चेतन तत्व “मैं” भला उस अचेतन “आसमान” में कैसे विलीन हो सकता है ।
मंटो उस आसमान को बोध करने वाला हूँ , तो भला मैं कैसे उसमें विलीन हो जाऊँगा । एक वस्तु दूसरे वस्तु में मिल सकती है किंतु एक वस्तु और दूसरी जो वस्तु ही नहीं है उसके आपस में विलय संभव नहीं है । यह विलय सिर्फ कल्पना मात्र है । कलपना में ही यह विलय संभव है । ऐसी कल्पना करना कि मेरा विलय उस आसमान में हो गया , मात्र यही संभव है । किंतु विलय का मूल अर्थ तो यह है कि वापस उसके मूल स्वरूप में लाया नहीं जा सकता है । यहाँ जब “मैं” उस आसमान में विलीन हो जाता हूँ तो मुझे हमेशा यह स्मृति रहती है कि विलीन हो जाता है । जब कि “मैं” यदि उस आसमान में विलीन हो गया तो मुझे स्वयं के होने का बोध मात्र तक नहीं होना चाहिए । क्योंकि “मैं” तो विलीन हो गया ।
यहाँ यह भी ध्यान देना है , यहाँ तक कि गहन निद्रा में भी स्वयं का विलीनीकरण नहीं होता है । यदि “मैं” उस अज्ञात शून्य में विलीन हो जाये तो उसके वापस आने की सारी संभावना समाप्त हो जाएगी । इसी को तो मृत्यु कहते हैं । इसलिए “मैं” कभी भी, किसी भी अवस्था में, किस में भी, विलीन नहीं हो सकता है । उसकी सता स्वतंत्र है । अर्थात् एक बोधवान, ज्ञानवान किस ऐसी सत्ता में जो जड़ है उसमें विलीन होने की कल्पना तो कर सकता है किंतु कभी भी किंचित मात्र विलीन नहीं सकता है । सदा से ही वह पृथक है । उसको किसी से जुड़ने का भ्रम यदि अहि तो सिर्फ़ अज्ञानता के ही कारण है ।
इसीलिए मैं अपने अनुभव से कहता हूँ कि न तो आप वास्तव में गहन निद्रा में विलीन हो सकता हूँ और न ही न ही मैं आकाश में विलीन हो सकता हूँ । मैं स्वतंत्र , सांत्वना हूँ , ज्ञानमय हूँ , कहीं भी विलीन नहीं हो सकता हूँ
Copyright - by Yogi Anoop Academy